Friday, March 7, 2008

हमारा सृजन संघर्ष जारी है

मनोज कुमार पंकाज

जेहन में हो अ़गर अतीत की गर्माहट
मालूम हो बहुरुपिया वर्तमान का सच
ठीक-ठीक पता हो
समय का साइन्स
अंतडियों में खौलती मैग्मा का सेन्टर
और कर ली गई हो
रोटी पर कील ठोंकने वालों की शिनाख्त
तो बदला जा सकता है-
हवा का रूख
रोकी जा सकती है सूरज की मनमानी
चांद की बेवफाई
उठ सकता है
कलम-कूंची से भी तूफान
फूट सकता है ज्वालामुखी
बदल सकती है औरत की परिभाषा
क्योंकि उसकी कोख में पल रहा है
तुम्हारे कंप्यूटर युग का भगत सिंह.
नये साल के स्वागत में मुक्ति की अदम्य आकांक्षा लिये 'उम्मीदें २००८' नई रचना और नये सृजन की पुरसुकून आह्ट ले कर आई .
कला और संस्कृति की राजधानी बनारस में 'उम्मीदें' कला महोत्सव का आयाम लेती जा रही है. यहाँ कला दीर्घा के दायरों से निकल कर कला अपना मुक्ताकाशी विस्तार तलाशती है. यहाँ रचना और रचनाकार अपने अस्तित्व का अर्थ तलाशते हैं और इसके लिए कला-प्रेमी-पारखी आम जन से सहज संवाद बनाते हैं.
बनारस में कला की हर विधा-साहित्य, संगीत, नाटक, चित्र व मूर्ति कला के प्रति जो बनारसी लगाव, समझदारी, और आत्मीय ग्राह्मता है, वह दुर्लभ है. कला के प्रति लगन और लगाव की इस संस्कृति को विकसित करने में काशी के कलाकारों की सदियों से चली आ रही अनवरत साधना की अहम भूमिका रही है. 'उम्मीदें' काशी की इस विरासत को आगे ले चलने का समवेत प्रयास है.
संचार माध्यम नयी पीढी़ के लिये हर पल बदलती रंगीन रोशनी और गहराते उन्माद के जहरीले धुएँ की ऐसी डिस्को दुनिया परोस रहे हैं जहाँ किसी भी चीज की हैसियत, उसका वजूद सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका बाजार भाव तय करता है. किसी भी 'चीज' से मतलब इन्सान समेत हर उस चीज से है जो इन्सानी उपलब्धि और कल्पना के दायरे में है. कला और संस्कृति इससे अलग नहीं है. आज का कलाकार भी उपभोग के इस माया बाजार में बिकने के लिए मजूबर है. इस बाजार में कला और हुनर की कीमत रचना के सौन्दर्य और अन्तर्वस्तु से नहीं बल्कि कलाकार के नाम के टैग से होती है. कला और रचना से परे कलाकार खुद एक 'ब्रांड'- एक स्टेट्स सिंबल, एक कारपोरेट एन्टिटी बन जाता है. कला और कलाकार का संपूर्ण बाजारू पर्याय जिसके सामने लाखों कलाकार और उनकी रचना अपने अस्तित्व और अस्मिता से वंचित हो जाते हैं- ठीक उसी तरह जैसे आज की सत्ता के लिए बाजार के दायरे से बाहर कोई भी इन्सानी वजूद नहीं हैं- भले ही उनकी तादाद अरबों में क्यों न हो.
'उम्मीदें कला और कलाकार की इस मजबूरी को नये सृजन की चुनौती है. इसके लिए हर कला विधा से जुडे़ रचनाकार को अपने आप से लड़ना होगा. पराभव के अहसास और मोहग्रस्तता को बेरहमी से तोड़ना होगा. अपने अन्दर के जुझारू, बेपरवाह कलाकार को मुक्त करना होगा.
'उम्मीदें' तमाम कला विधाओ के सृजन और सृजनकारों को साझी जगह और जरूरत से जोड़ने की कोशिश है जिससे वे एक दूसरे को समृद्ध करते हुए आम जन की दुनिया से जुड़ सकें जहाँ उनके वजूद की जमीन और विस्तार का अनन्त आकाश दोनों ही हैं.
फ़ितरत हमेशा ही अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने की रही है और सच्चे रचनाकार सत्ता की चुनौतियों से हमेशा ही दो-दो हाथ करते हुए रचना को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते आये हैं. इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाते रहे हैं. कोई भी कीमत चुका कर अभिव्यक्ति और सृजन के खतरे मोल लेने का हौसला ही गुयेर्निका की चीख, गुरूशरण के नाटक और गदर के गीत रचता है.
हमारे देश का सत्ता प्रतिष्ठान भी अभिव्यक्ति पर पाबन्दी और पहरे के उन्मअत्त और उदंड प्रयास करता रहा है. साल २००७ भी इसका अपवाद नहीं रहा. हुसैन के साथ जो हुआ उसे कौन नहीं जानता. बडौ़दा के युवा चित्रकार की पेन्टिंग प्रदर्शनी में तोड़-फोड़ और दुर्व्यवहार समूचे रचनाधर्मी समुदाय के लिए बेहद शर्मनाक घटना थी जिसका देश भर में कवि-कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने विरोध किया. मगर अफसोस कि बनारस में दो बडे़ कला संस्थान होने के बावजूद इस लम्पट उदंडता के खिलाफ कोई संगठित आवाज नहीं उठ सकी.
निर्वासन की त्रासदी झेल रही, महिला मुक्ति की हौसलाकुन आवाज, बंगलादेश की मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन को पनाह देने में हो रही सियासत और बीते दिनों उनके साथ हुए दुर्व्यवहार ने सत्ता प्रतिष्ठान के दलाल और लम्पट चरित्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है. मगर एक बार फिर अफसोस कि इस बार इस सवाल से देश के ज्यादातर रचनाकार-बुद्धिजीवी कतराते नजर आ रहे हैं. चुनौतियों से कतराने का यह शुतुरमुर्गाना अन्दाज अभिव्यक्ति और सृजन की स्वतंत्रता पर सत्ता के हमले रचना का वाक-ओवर तो नहीं है?
कतराना न तो सृजन की परम्परा रही है और न ही सृजनकार की फितरत. सृजन के खतरे मोल लेने का हौसला तभी आता है जब सृजनकर्ता आम आदमी की मुक्ति की अदम्य आकांक्षा से जुड़ता है. मुक्ति की वह अदम्य आकांक्षा जो बनारस के नाविक को, पूर्वांचल के बुनकर को, महाराष्ट्र और आंध्र के किसान को, गुड़गांव के मजदूर को, बेरोजगार नौजवान को, बलात्कृता औरत को, सिंगूर और नन्दीग्राम को, भुखमरी, उपेक्षा, प्रताड़ना और दमन की दहलीज पर घुटने टेकने से रोकती है. मुक्ति की यह अदम्य आकांक्षा ही नये सृजन की आशा है.
उम्मीदें २००८ नये सृजन की इसी आशा की ओर हम सृजनकारों का हौसले के साथ बढ़ाया गया कदम है.

Sunday, January 27, 2008

उम्मीदें 2008 .....कला उत्सव
















Tuesday, January 1, 2008

2008 की दहलीज़ पर नयी उम्मीदों के साथ..















































Saturday, December 22, 2007

..आप क्या सोचते हैं कि कलाकार क्या है? क्या वह कोई मंदबुद्धि व्यक्ति है

कला और उसके रचना संबन्धों के बारे में पाब्लो पिकासो के विचारों का एक कोलाज


कला को क्यों समझें
.....हर कोई कला को समझना चाहता है। कभी हम चिड़िया के गाने को समझने की कोशिश करते हैं। हम रात से, फूलों से और चारों ओर की हर चीज़ से क्यों प्रेम करते हैं? लेकिन जब पेंटिंग की बात आती है तो लोग उसे समझना जरूरी मानते हैं। काश वे पहचान पाते की आखिर कलाकार अपनी अनिवार्यतावश ही काम करता है, कि वह खुद इस संसार का एक मामूली-सा हिस्सा है, और यह कि उसे संसार की उन दूसरी चीज़ों के मुकाबले कोई ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, जो हमें अच्छी लगती हैं, हालाकि हम उनकी व्याख्या नहीं कर पाते।
.....लोग अब भी आधुनिक कला को नहीं समझते, लेकिन इसमें न कालाकार का दोष है न लोगों का। इसका कारण यह हैं कि उन्हें कला के बारे में कुछ नहीं सिखाया गया है, लेकिन यह किसी को नहीं सूझा कि लोगों को पेंटिग को देखना भी सिखाया जाये। मसलन यह कि शायद यह रंगो की शक्ल में कविता है, या किसी फार्म या लय का जीवन हो सकता हैं। कुल मिलाकर वे रुपंकर कला की मूल्यवत्ता से पूरी तरह अनजान हैं। (1946)

कला और प्रकृति
.....प्रकृति और कला दो भिन्न चीजें होने के कारण कभी एक चीज नहीं हो सकती। कला के माध्यम से हम अपनी यह अवधारणा व्यक्त करते हैं कि प्रकृति में क्या नहीं है। (1923)
.....प्रकृति एक चीज़ है और पेंटिग एक बिल्कुल दूसरी चीज़। पेंटिग, प्रकृति के बराबर हैं। हमें प्रकृति का बिंब देने के लिए कलाकारों का आभारी होना चाहिए। हम प्रकृति को उनकी आंखों से देखते हैं।

रेखांकन
.....अगर रेखाओं और आकारों का तुक मिल जाये और वे सजीव हो उठें तो यह कविता जैसा होगा। इसे हासिल करने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी बहुत लंबी कविता की बनिस्पत दो या तीन पंक्तियों में ही कहीं ज्यादा कविता संभव हो जाती है। (1946)
.....जो मैं कर रहा हूँ वह जब मेरे बगैर अपनी स्वतन्त्र बात करने लगे तो समझिए मैं जीत गया। और मेरे ख्याल से मैंने फिलहाल जो पाया है वह इतनाभर है कि मैं रेखांकन की कला में एक कारीगर की अवस्था से आगे चला आया हूं। जब ऎसा होता है कि मैं बोलना बंद करता हूँ और मेरे बनाये रेखांकन ही बोलने लगते हैं और वे मुझसे दूर चले जाते हैं और मेरा उपहास करने लगते हैं तो मुझे लगता है कि मैंने अपना लक्ष्य पा लिया है। (1956)
.....विचार सिर्फ प्रस्थान बिंदुओं की तरह हैं। वे जब दिमाग में आते हैं तो मैं कभी-कभार ही उन्हें पकड़ पाता हूँ। मैं जैसे ही काम करने बैठता हूँ, कलम से दूसरे विचार निकलने लगते हैं। जब एक खाली कागज मेरे सामने होता है तो वह हमेशा दिमाग में घूमता रहता है। इस मामले में मेरी इच्छा जो भी हो, अपने विचारों से ज्यादा दिलचस्प मुझे वह लगता है जो मैं व्यक्त कर रहा हूँ। (1966)

रंग
....फिलहाल रंगों में मेरी दिलचस्पी कम ही है, गुरुत्व में ज्यादा है, और सघनता की तो बात ही क्या है। (1956) आकृतियों की ही तरह रंग भी संवेगों के अनुरूप बदलते रहते हैं।

संग्रहालय
.....संग्रहालयों में ऎसी ही कलाकृतियां होती हैं जो नाकाम रही हों। .....क्या आप हँस रहे हैं? ज़रा सोच कर देखिये और आप समझ जायेंगे कि मैं सही कह रहा हूँ या गलत। आज हम जिन्हें 'मास्टरपीस' कहते हैं, वे सभी कृतियाँ उस दौर के मास्टर्स के बनाए हुए नियमों को तोड़कर बनाई गई थीं। बेहतरीन काम वही है जो साफ-साफ उस कलाकार के किसी ’दोष’ की जानकारी देता हो। (1948)
......अगर आप किसी कलाकृति को नष्ट करना चाहें तो आप कुछ नहीं बस इतना कीजिए कि उसे एक कील पर खूबसूरती से टांग दीजिए और तुरन्त ही आपको उसके फ्रेम के अलावा कुछ नहीं दिखाई देगा। कला को तभी बेहतर देखा जा सकता है जब वह अपनी जगह पर न हो। (1958)

राजनीति
.....आप क्या सोचते हैं कि कलाकार क्या है? क्या वह कोई मंदबुद्धि व्यक्ति है जो अगर पेंटर है तो उसके पास सिर्फ आंखें होंगी, अगर संगीतकार है तो उसके सिर्फ कान होंगे या अगर कवि है तो उसके दिल के हर कोने में एक वीणा बज रही होगी, और यहाँ तक कि अगर वह बाक्सर है तो उसके पास सिर्फ कुछ मांसपेशियां होंगी? नहीं, इसके ठीक उल्टा है। वह पेंटर होने के साथ ही एक राजनैतिक प्राणी है जो दुनिया की भयावह, प्रेमपूर्ण या खुशनुमा घटनाओं के प्रति सतर्क है और लगातार उनके रूपरंग में अपने को ढालता रहता है। यह कैसे मुमकिन है कि आप दूसरों से सरोकार न रखें? किस ठंढी उदासीनता से यह संभव है कि आप अपने को उस जीवन से काट कर रखें जो इतने विपुल स्तर पर आप तक पहुँच रहा है? नहीं, पेंटिंग घरों को सजाने के लिए नहीं है। यह शत्रु के खिलाफ एक आक्रामक और एक रक्षात्मक हथियार है।(1945)
.....हम कलाकार अविनाशी हैं, जेल में भी और यातना शिविरों में भी। मैं अपने कला संसार का खुदा रहूँगा ही, भले ही मुझे काल कोठरी में अपनी गीली जीभ से धूल भरे फर्श पर पेंटिंग करनी पड़े।(1949)

(डोरे एश्टन द्वारा संपादित पिकासो के विभिन्न इंटरव्यू, लेखों और वार्ताओं के चयन की अंग्रेजी पुस्तक "पिकासो आन आर्ट" का मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित संकलन से साभार चयनित अंश)

Tuesday, December 18, 2007

महा कवि का महाप्रयाण -२

अजय कुमार

सुनने पढ़ने में सतर्क थे। एक बार विषय ठीक से पता न होने के कारण मैंने उर्दू कविता में सामाजिक बदलाव के बदले उर्दू कविता का इतिहास ही लिखमारा। एक साथी ने कमेंट किया "अजय जी बदलाव की चर्चा करने के बजाय इतिहास ही लिख लाये"। अध्यक्षीय वक्तव्य में त्रिलोचन जी ने कहा, " आधार पत्र में तमाम कवियों के संदर्भ सामाजिक बदलाव के ही संदर्भ हैं। लगता है आपने ध्यान से नहीं सुना है।" जाहिर है त्रिलोचन जी ने ध्यान से सुना था। एक गोष्ठी में मिलते ही कहा, "वामिक साहब की आत्मकथा 'समय' के हर अंक में नहीं छाप रहे हो।" मैंने कहा, "नहीं हर अंक में छ्प रही है।" जौनपुर लौटकर कन्हैया, जिस पर अखबार छ्पवाने की जिम्मेदारी थी, जिक्र किया तो उसने कहा, "ठीक कह रहे थे, एक अंक में नहीं जा पाई थी।" यानी 'समय' ध्यान से पढ़ते थे और आत्मकथा का लगता है इन्तज़ार करते थे।

लखनऊ के दलित साहित्य सेमिनार के मौके पर मुझे त्रिलोचन जी के साथ उस कमरे में ठहरने का सौभाग्य मिला जिसे दिन में कामरेड विनोद मिश्र ने खाली किया था (अपनी लुंगी भी वे खिड़की पर टंगी हुई भूल गये थे)। तब तक सर्दी बाकायदा शुरु नहीं हुई थी लेकिन गेस्ट हाउस लान के बीच और नहर के किनारे होने के कारण कमरा ख़ासा ठंडा था। सोने के लिये त्रिलोचन जी ने अपनी ऊनी चादर निकाली और मेरे पास कुछ न देखकर सलाह दी कि दरवाजों के पर्दे उतार लीजिये। मैंने कान नहीं दिया और एक रिश्तेदार के लिये भिजवाई आशा की साड़ियाँ ओढ़कर सो गया। रात ऎसी गुज़री कि अब भी याद है। और उनकी नेक सलाह भी "पर्दे उतार लीजिये"।

सेमिनार के बाद अतिथिगृह जाते हुए टेम्पो में मेरी किसी बात पर बोले, " आपसे कौन जीत सकता है? आप तो अजय हैं।" मैंने कहा अजय माने तो हुआ जिसकी जय न हो। बोले, "नहीं जिसको जीता न जा सके।" और मानस की एक अर्ध्दाली सुना दी "जीत सकै को अजय रघुराई"। फिर बताया, "जाट कोई एक जात नही है। सभी जाति के लड़ाकुओं को मिलाकर बनी जात है।" प्रमाण पेश किया - "अवधी में जाट का अर्थ होता है लड़ाकू। कहते हैं फलनवा बड़ा जट्ट आदमी है"। यानी वे सिर्फ मुझे, भाई और पिता को ही नहीं जानते थे; खानदान की खबर भी रखते थे।

वहीं अतिथिगृह के भोजनकक्ष में डोंगों और प्लेटों के आदान-प्रदान के बीच किसी ने हरी मिर्च की प्लेट मेरी तरफ बढ़ाई-"क्या आप इसे लेना पसन्द करेंगे?" मेरे मुँह से निकला- "मैं उसे देखना भी पसन्द नहीं करता।" बातचीत के दौरान खाने-पीने की चीजों में औषधि गुणों की बात आ गई। त्रिलोचन जी आदत के अनुसार कोर्सेस में लंच ले रहे थे यानी दाल रोटी सब्जी बारी-बारी से निपटा रहे थे। बिना दाहिने बायें देखे बोले, "जिसे अजय जी देखना भी पसंद नहीं करते उसमें भी अनेक औषधि गुण हैं। इलाहाबाद में राष्ट्रीय परिषद की बैठक के दौरान जब हमलोग नर्मदेश्वर जी के यहाँ से खाना खाकर आ रहे थे त्रिलोचन जी एक पेड़ के पास ठिठ्क गए। बोले, "यह बकाइन है, भैषजशास्त्र में इसे महानीम कहते हैं। इसमें बड़े औषधि गुण होते हैं।" उनके इस गुण के बारे में अवधेश जी से सुन चुका था। कितने ही अनाम पेड़ पौधों के नाम उन्हें उनसे पता चले थे। कितने ही फूलों के संस्कृत नाम भी। वे माटी से जुड़े निहायत ज़मीनी आदमी थे। तभी माटी की गंध से सुवाषित ऎसी अमर रचनाओं का भण्डार छोड़ गये हैं वे अपने पीछे। और भी उस दौर में जब हिन्दी कविता आयातित विचारों से इस कदर आक्रांत थी। अच्छे-अच्छे विदेशी मुहावरों का अनुवाद कर रहे थे नये के नाम पर।

अपने पिता की जन्मशताब्दी की अध्यक्षता करने के लिए मैंने उन्हें आमंत्रित किया। जवाब आया- " आप बुलायें और मैं न आऊँ यह कैसे हो सकता है।" इस अवसर पर पिता के तीन कर्मक्षेत्रों - स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता और साहित्य पर सेमिनार हुए और इन तीन क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए तीन लोगों को "समय सम्मान" से सम्मानित किया जाना था। साहित्य के लिये त्रिलोचन जी को चुना गया था। सम्मान समारोह शुरु होने के पहले वे बोले, " आप का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ अब मुझे छुट्टी दीजिये तो ए.जे. पकड़ कर निकल जाऊँ और एक दिन इलाहाबाद भी रुक लूँ।" तब तक सम्मान पत्र फ्रेम होकर नहीं आ पाये थे। मैंने माला और शाल से सम्मान की औपचारिकता पूरी करके उन्हें विदा किया। थोड़ी ही देर में सम्मान पत्र भी फ्रेम होकर आ गया तो भागकर स्टेशन पहुँचा। प्लेटफार्म नम्बर दो पर इलाहाबाद जौनपुर पैसेन्जर का इन्तज़ार करते हुए त्रिलोचन जी एक बेंच पर आसीन थे। मैंने सम्मान पत्र दिया तो रैपर का काग़ज़ हटाकर सम्मान पत्र को देखा और अटैची में रख कर बोले, " इसमें भी एक लतीफा है। जब कोई लिखना बन्द कर देता था तो हम लोग उसे महाकवि की उपाधि दे देते थे।" मैंने सम्मान पत्र में उनके नाम के पहले महाकवि लिखवा दिया था, जो वो थे भी।

एक लतीफा इसमें और रह गया। आशा जिसके सर पर उनके खाने-ठहरने का इन्तजाम था, उनके सहायक से पता करके सब कुछ ठीक ठाक निपटा दिया था। यहाँ तक कि थरमस में गरम पानी भी बिस्तर के सिरहाने रख दिया था। सुबह नाश्ते के लिए दलिया वगै़रह लेकर आयी तो पूछा, " आपको यहाँ कोई तकलीफ तो नहीं हुई?" वे लोगो से घिरे बतिया रहे थे, मुड़कर बोले, " जिसकी आप जैसी माँ हो उसे भला क्या तकलीफ हो सकती हैं।" आशा खिसिया गई, हो सकता हैं कोई हँस दिया हो। वहाँ क्या कहती मुझको पूरा वाक़या सुनाकर बोली, "तुम्हारे त्रिलोचन जी सठिया गये हैं क्या? भला मैं उनकी माँ जैसी लगती हूँ?" मैंने ठहाका लगाया तो और बौखला गई। मैंने दिलासा दिया, "माँ से उनका मतलब था माँ जैसी देखभाल करने वाला।" तब लगा जैसे उसे अपने किये का प्रतिदान मिल गया है।