Thursday, February 18, 2010

ख्याति प्राप्त अभिनेता और रंगकर्मी निर्मल पांडेय का निधन












हिंदी सिनेमा और नाट्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर निर्मल पांडेय  का आज दिनांक १८ फरवरी २०१० को मुंबई के होली स्पिरिट अस्पताल में निधन हो गया. निर्मल पाण्डेय एक प्रतिबद्ध प्रगतिशील संस्कृतकर्मी थे. जिन्होंने जीवनपर्यंत अपनी रचना और कला क्षमता का उपयोग मनुष्य और समाज के सरोकारों के लिए किया. 
  निर्मल पाण्डेय मुलत:  रंग-कर्मी थे जिन्होंने "जिन लाहौर नही देख्या'' जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटकों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया. सिनेमा जगत में शेखर कपूर की 'बैंडिट क्वीन', 'इस रात की सुबह नहीं', ट्रेन टू पाकिस्तान' जैसी फिल्मों में अपनी मुख्य भूमिका के जरिये सिनेमा के कथ्य कथानक और अभिनय की नयी परिभाषाये दीं. बहुत सारे सीरियलों एवं टी वी फिल्मों के जरिये निर्मल ने इस माध्यम में भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करायी.
  ''क्राफ्ट'' (उसकी समस्त इकाई कला कम्यून, दस्ता, क्राफ्ट फिल्म सोसाइटी) वाराणासी की संकल्पना और संस्थापना में निर्मल का अविस्मरनीय  योगदान है. हमारे लिए कई अभिनय वर्कशाप का संचालन निर्देशन करके और संस्था द्वारा आयोजित होने वाले फिल्मोत्सवो में योजना से लेकर क्रियान्वयन तक अपनी भागीदारी से हमें आधार और दिशा प्रदान की.
निर्मल का निधन पुरे क्राफ्ट परिवार के लिये अपूरनीय व्यक्तिगत क्षति है. निर्मल का निधन पुरे सांस्कृतिक जगत और समस्त कला-संस्कृति-रंग कर्मियों  के लिए एक गहरा सदमा है.
  निर्मल के असामयिक अचानक निधन पर सम्पूर्ण क्राफ्ट परिवार ( कला कम्यून, दस्ता, क्राफ्ट फिल्म सोसाइटी), जन संस्कृति मंच एवंम काशी की समस्त कला-संस्कृति-रंगकर्मियों की ओर से विनम्र और अश्रुपूरित श्रध्दांजलि.

Sunday, February 14, 2010

बारिश में भी कायम रही कलाकारों की "उम्मीदे"

दो दिवसिय इस आयोजन की शुरुआत प्रकृति के एकाएक असंतुलित होने के बावजूद अपने निर्धारित समय पर अस्सी घाट पर हुई.
कला उत्सव की शुरुआत इलाहाबाद से आए वरिष्ट चित्रकार व कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अजय जैतली ने रंग-बिरंगे गुब्बारों को आकाश में उड़ा कर की, और  उम्मीदे में आये सभी कलाकारों का अभिवादन किया. जैतली जी ने कला को लोगो तक ले जाने के इस तरीके को विस्तारित करने की बात कहीं. सभी कलाकृतियों को उन्होनें देखा और दस कलाकृतियों को चुना जिन्हें उत्सव के अंतिम दिन सम्मानित किया गया. कला उत्सव में २५०-३०० कला कृतियों का प्रदर्शन हुआ जिसमें बी.एच. यु., विद्यापीठ , गोरखपुर, लखनऊ, इलाहबाद, पटना, जौनपुर, फैजाबाद, छत्तीसगढ़ व चेन्नई,  के कलाकारों ने भाग लिया. 2002 में क्षेत्रीय स्तर पर शुरू किये गए इस प्रदर्शनी ने आज रास्ट्रीय उत्सव का स्वरूप ले लिया है.
इस बार प्रदर्शनी में पांच इन्सटालेशन प्रदर्शित किये गए जो कला जगत के बदलते स्वरूप को बतला रहा है. इसमें सत्ता की राजनीति से लेकर उसके अमेरिका के चरणों में नतमस्तक होने और भारत के ८०% जनता के ऊपर पड़ते बोझ को बखूबी दिखाया गया है. कला कम्यून द्वारा किये गए २० फुट के इन्सटालेशन में आम आदमी के ऊपर लादे गए भागदौड़ और उसके शांति की लालसा के अंतर्विरोधी स्थिति को दिखाया गया है.
शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम की आगाज पटना से आई 'हिरावल' टीम ने गोरख पाण्डे, महेश्वर, वीरेन, और मुक्तिबोध के गीतों के साथ किया. दर्शको ने इस तरह के गीतों को जो आज के समाज का आइना है हाथों - हाथ लिया और सराहा. जन गीतों के बाद 'सत्यजित रे' निर्देशित 'मुंशी  प्रेमचंद जी' की कहानी पर आधारित फ़िल्म ''सदगति'' का शो हुआ. सत्यजित रे जैसे निर्देशक की नजर से इस फ़िल्म को देखना भी दर्शकों के लिए एक ख़ास अनुभव  रहा.
उत्सव के दुसरे दिन क्राफ्ट की नाट्य- गायन  इकाई 'दस्ता' द्वारा नाटक ''आर्डर-आर्डर'' प्रस्तुत किया गया. यह नाटक भारतीय न्याय प्रणाली के माध्यम से राजनीति मे घुल मिल चुके अपराध और सामप्रदायिकता को बखूबी दिखाती है. सत्ता पर चोट करती हुई नाटक बताती है की भारतीय सत्ता अमेरिका की दलाली में लगी हुई है. नाटक में अंकुर, उदभव, और विवेक ने भूमिका निभाई. श्रुति, विनीता, अंकुर, उदभव, व अर्जुन ने जनगीतों की प्रस्तुती की.
    इस पुरे आयोजन के दौरान दर्शकों की स्थिरता बनी रही और शहर के कई बुद्दिजिवी, कलाकार, साहित्यकार, व आमजनों ने कला उत्सव के इस संगम  में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई मुख्य तौर से क्राफ्ट के अध्यक्ष वी. के. सिंह, महासचिव उदय यादव, इलाहाबाद से के.के.पांडे, मीना राय, लखनऊ से अपूर्व, गोरखपुर से अनुज, मनीष, छत्तीसगढ़ से रंधावा प्रसाद, गिरिधारी साहू सहित शहर से काशीनाथ सिंह, शाहीना रिजवी, प्रो.बलराज पांडे, प्रणाम सिंह, प्रो. वशिष्ट अनूप, आदि गणमान्य लोग मौजूद रहे

Sunday, March 22, 2009

भारतीय कला का आत्मसम्मान विहीन पिछला दशक

आजादी के बाद भारतीय साहित्य, संगीत, नाटक और चित्रकला आदि को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय और राज्य कला अकादमियों की स्थापना की गयी. इन अकादमियों की स्थापना के पीछे वास्तव में क्या उद्देश्य था यह आज इतिहासवेत्ताओं के लिए शोध का विषय हो सकता है. पर लगभग पाँच दशकों से लम्बे इनके अस्तित्व के बाद यह स्पष्ट है कि जनता की मेहनत की कमाई से वसूले गये सरकारी करों के पैसों पर बुध्दिजीवियों, साहित्यकारों और कलाकारों के लिए अपनी संकीर्णता प्रमाणित करने का एक सरकारी मंच बनने के अतिरिक्त ऎसी अकादमियों ने कुछ नहीं किया. समकालीन भारतीय कला के विकास के लिए बनी ललित कला अकादमी के अलावा भी हमारे देश में कई गैर सरकारी कला संस्थाएँ सक्रिय हैं. यदि गैर सरकारी संस्थाओं के बनने के पीछे भूमि और सम्पत्ति सम्बन्धी सरकारी प्रतिबन्धों और कर सम्बन्धी आर्थिक नियन्त्रक नियमों का ठेंगा दिखा कर अपना कार्य व्यापार चलाए जाने और साथ ही कलाप्रेमी कहलाने के दोहरे लाभ के प्रति प्रतिष्ठानों के लोभ को यदि नज़रअन्दाज कर भी दिया जाए फिर भी गैर सरकारी और सरकारी कला अकादमियों का चित्रकला और चित्रकारों के बारे में उनके रवैयों में अदभुत साम्य नज़र आता है. कला के प्रति इन संस्थाओं के सामन्ती नजरिये का ही फल है कि वे कुश्ती, मुक्केबाजी, तीरन्दाजी और दौड़ जैसी क्रीङा प्रतियोगिताओं की तरह चित्रकला के लिए भी प्रतियोगिताओं का हास्यास्पद आयोजन कर, कलाकार की कृतियों का मूल्यांकन करने की हिमाकत कर पाते हैं. केन्द्रिय ललित कला अकादमी तो न केवल अपनी वार्षिक प्रदर्शनी में चयनित कलाकारों को ही अकादमी के सदस्य चुनने के लिए मतदान के योग्य मानता है बल्कि ऎसे कलाकारों के लिए परिचय-पत्र भी जारी करता है. अर्थात यदि कोई ललित कला की वार्षिक प्रदर्शनी जैसी सामन्ती व्यवस्था से सहमत न हों तो वह भारत में, सरकारी अर्थ में कलाकार ही नहीं है. दुर्भाग्य से कला अकादमियों की इन गैरलोकतान्त्रिक सामन्ती हरकतों के खिलाफ हमारे देश के चित्रकारों ने कभी सवाल नहीं उठाया. उन्होंने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि वे कवि, लेखक, रंगकर्मी या किसी अन्य कलाकार के साथ एक कतार में खड़े हैं या नहीं; क्या कोई अन्य कला अकादमी भी कला और कलाकारों के मूल्यांकन में खिलाड़ियों के मूल्यांकन की रीति अपनाती है; क्या कोई कवि या लेखक अकादमी द्वारा सरकारी मान्यता प्राप्त कवि-लेखक-रंगकर्मी होने का परिचय-पत्र पाकर इठलाता है.
यह सत्य है कि मामूली जोड़-तोड़ से ललित कला अकादमी जैसी संस्थाओं से परिचय-पत्र, पुरस्कार और उपाधियाँ तो सहज ही मिल सकती है और मिलती है पर अपने आत्मसम्मान और मूल्यों की रक्षा स्वयं एक चित्रकार को ही करना होता है - चित्रकारों के एक बहुत बड़े वर्ग ने इस विषय पर सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस की. ऎसे विवेक विहीन चित्रकारों का अन्य रचनाकारों से सम्पर्क कट जाना- ललित कला और गैर सरकारी कला अकादमियों की देन के रूप में देखा जाना चाहिए.
सन १९४७ के बाद हमारे देश में संसदीय व्यवस्था ने एक खास वर्ग की सेवाओं में अपने अस्तित्व की सार्थकता खोजी जिसके फलस्वरूप सातवें और आठ्वें दशक के दौरान नवधनाढयों का एक विशाल वर्ग विकसित हुआ जो बहुत कम समय में सरकारी संरक्षण में बेलगाम मुनाफाखोरी, सट्टेबाजी के जरिए अकूत धन इकट्ठा करने में सफल रहा. यह सर्वथा एक नया वर्ग था जो आज़ाद हिन्दुस्तान में केन्द्रीय शक्ति के रूप में सामने आया. इस वर्ग ने श्रम और आर्थिक समृध्दि के बीच के रिश्ते को चुनौती दी और बाजार में निवेश के नाम पर सरकार द्वारा प्रायोजित सट्टेबाजी में अकल्पनीय धन कमाने में सफल रहा. इस कमाई में उनका श्रम नहीं था बल्कि करोड़ों श्रमिकों के श्रम और उपभोक्ताओं के लूट से ये पैसा आ रहा था. लिहाजा लखपति से अरबपति बनने में इस वर्ग को बहुत कम समय लगा.
यह वर्ग शक्ति सम्पन्न था. इसने राजनीति, धर्म, मनोरंजन से लेकर आधुनिक चकलों में अपना अधिकार जमाया. इसी श्रॄंखला में इसने धननिवेश के नये तरीकों को तलाशा. जमीन, शेयर आदि पर पैसा लगाने का तरीका पुराना पड़ रहा था. लिहाजा इस वर्ग ने दुनिया के दूसरे पूँजीवादी देशों की ओर देखा जहाँ चित्रकला में पैसा लगाने की परम्परा पुरानी थी. हिन्दुस्तान में कलाकृतियाँ बड़ी तादाद में सहज और कम दाम में उपलब्ध थी- जिसके चलते जल्द ही इस तबके को कला खरीद-फरोख्त के धन्धे में रस मिलने लगा था. इस वर्ग की यह मजबूरी थी कि खजाने में करोड़ों रुपये होने के बावजूद भी वह एक कविता, एक कहानी या एक नाटक या गीत खरीद कर अपना मालिकाना सिध्द नहीं कर सकता था इसीलिए इनका कला प्रेम चित्रकला तक सीमित रहा. कला व्यापार, एक ओर जहाँ उन्हें कला रसिक या कला पृष्ठपोषक होने का सुख देने लगा (जो ज़मीन या शेयर का धन्धा उन्हें कभी नहीं दे सकता था) वहीं एक अस्वाभाविक मुनाफा भी उन्हें मिलने लगा.
इसके समानान्तर चित्रकार एक सर्जक के रूप में साहित्यकार, रंगकर्मी या अन्य कलाकर्मी से बहुत पीछे रह गया. उनके बीच किसी तरह की समानता खोजना अब कम-से-कम भारत में तो कठिन से कठिनतर होते जा रहा है. सृजन के नाम पर आज अपनी परम्परा से कटकर भारतीय चित्रकारों का एक वर्ग पश्चिम के सौ साल पहले के असफल पर चौंका देनेवाले कला आन्दोलनों का अर्थहीन अनुकरण कर रहा है. दो विश्वयुध्दों के बीच फँसे समय में दादावाद और उत्तर दादावाद की सामाजिक, राजनीतिक पृष्ठभूमि और मौजूदा भारत के 'इंडिया शाइनिंग' और 'इं ०२१ क्रेडेबिल इंडिया' जैसी परिस्थियों के बीच के अन्तर को समझने और उनकी विसंगतियों को पकड़ने का बौध्दिक संसाधन ऎसे चित्रकारों के पास, निश्चय ही नहीं है. और इन्हीं कारणों से एक चित्रकार अपने समय के साहित्यकार, रंगकर्मी और रचनाकारों की कतार से निकल कर 'माल' बनानेवाले पर कलाकार कहलानेवाले व्यक्ति के रूप में 'बाजार' में अपनी दुकान चलाने में अपनी शक्ति झोंक रहा है.
भारत में पिछला एक दशक आत्मसम्मानहीन कलाकारों और उनकी कला के विकास का दशक रहा है. यह सत्य शायद समान रूप से सभी कलाकारों पर नहीं लागू होता है. पर समकालीन हर भारतीय कलाकार बाज़ारवाद के गिरफ्त में बन्दी है, यह सत्य समान रूप से समकालीन सभी कलाकारों पर लागू होता है.
चूँकि बाज़ार की अपनी शर्तें होती है जिसके तहत 'कलाकृति' का 'माल' में तब्दील होना प्राथमिक शर्त है. और बाज़ार में किसी माल (ब्रांड) के बिकने लिए उसका विशिष्ट होना और उसका दूसरे ब्रांडों से भिन्न होना जरूरी है. साथ ही विपणन (मार्केटिंग) के लिए विज्ञापन के लिए कई कलाकारों ने अपने आत्मसम्मान को ताक पर रख तमाम अर्थहीन हथकंडे अपनाए. उन्होंने नेताओं-अभिनेताओं और उद्दोगपतियों के साथ मिलकर चित्र रचने का नाटक रचा. और चित्रकला को प्रदर्शन कला की ओर ले जाने की कोशिश की. सत्ता पक्ष के नेता पी चिदम्बरम, प्रफुल्ल पटेल, अम्बिका सोनी, शाहरुख खान, दिलीप कुमार, सायरा बानो जैसे अभिनेता और रतन टाटा सरीखे उद्दोगपतियों ने देश के शीर्षस्थ कलाकारों के कैनवासों पर कूची फेरने का महज सुख ही नहीं लिया बल्कि इनके 'मिडास-स्पर्श' से चित्रों को बाद में ऊँची कीमत पर बिकने का आधार भी मिला. इसे लेखक-कबि-रंगकर्मी, गायक आदि कलाकारों का भाग्य ही कहा जाएगा कि राजनीति या पैसे की ताकत के बल पर उनकी कला में कोई इस प्रकार का शर्मनाक हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है. चित्रकारों के आत्मसम्मानहीन रवैयों के नये नये स्वरूप हमें आनेवाले समय में और भी देखने को मिलेंगे. क्योंकि यह सब उस बाजार के नियमों के तहत हो रहा है जिसमें कलाकार एक 'माल-निर्माता' से ज्यादा कुछ नहीं है.
बाज़ार का यही पक्ष कला के लिए संकट और चिन्ता का विषय बन जाता है, क्योंकि इस कार्य-व्यापार में कला का मान निर्धारण प्राय: असम्भव हो जाता है. ऊँचे दामों में बिकनेवाली कलाकृतियों को समाज प्राय: बेहतर कलाकृति मानने की भूल कर बैठता है. सफल चित्रकारों का अनुकरण करना नवोदित कलाकारों के लिए प्राय: सहज आकर्षण बन जाता है. कला में श्रेष्ठ-सामान्य-निकृष्ट की पहचान धीरे-धीरे विकृत होने लगती है. ऎसे वक्त कला समीक्षकों का एक महत्वपूर्ण दायित्व हो जाता है कि बाज़ारवाद की तमाम भ्रामक स्थितियों में भी बेहतर कला के मानदंडों को चिन्हित करता रहे. पर दुर्भाग्य से एक ओर जहां बाजारवाद के चंगुल के बाहर कला समीक्षक भी नहीं है, वहीं दूसरी ओर इस कलाबाज़ार ने अपने लिए एक भाषा भी तैयार की है. अँग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी या किसी अन्य प्रान्तीय भाषा में कला समीक्षाएँ लगभग अर्थहीन होती जा रही है. ये समीक्षाएँ न तो बाज़ार को प्रभावित कर सकती है और न ही जनता को. सार्थक समीक्षा के अभाव का यह समय चित्रकला में अराजकता और तर्कहीनता के गहराने का समय भी है. नवधनाढ्य के जिस वर्ग की हमने यहाँ चर्चा की है, वह कला बाज़ार की संचालक शक्ति के रूप में पिछले एक दशक में और भी अधिक सक्रिय हुआ है. कला में 'नयेपन' की माँग यहीं से उठ रही है. इसी की माँग पर पिछले दिनों उत्तराधुनिक चित्रकला के नाम पर यौन विकृतियों को दर्शाते बड़ी तादात में चित्र बने. भारतीयता के नाम पर 'तन्त्र' को आधार मान ऎसे चित्रों की विदेशों में खासी माँग रही है. इन्टाँलेशन कला के नाम पर आधी सदी पुरानी पाश्चात्य कला का भारतीय संस्करण भी चौका देनेवाले रहे. कला में प्रयोग और परिवर्तनों की गति, संग्रहाकों की प्रवृति के अनुकूल तो है पर व्यापक समाज कहीं अधिकांश भारतीय चित्रकारों से बहुत पीछे छूट गया.
इस सत्य के साथ, कम-से-कम दु:खी होने जैसी बात नहीं हुई है, क्योंकि पिछले एक दशक में बाज़ारवाद के घटाटोप में 'श्रेष्ठ' 'अधिक बिकनेवाले' 'मँहगी बिकनेवाली' 'नीलामी में कीर्तिमान स्थापित करनेवाली' ऎसी समकालीन कला से अगर आम जनता अपरिचित ही रही तो उसने बहुत बड़ा या सार्थक कुछ नहीं खोया है.
अशोक भौमिक
प्रसिध्द चित्रकार व समीक्षक
(समयान्तर से सभार)

Friday, February 27, 2009

युवाओं से बदला ले रहा है संघ परिवार

कला कम्यून वाराणसी के वार्षिक कला उत्सव 'उम्मीदें' का अस्सीघाट पर उद्घाटन करते हुए जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि

युवाओं से बदला ले रहा है संघ परिवार
"मंदी और आतंकवाद से जूझते भारत की तस्वीर निराशा की नहीं बल्कि युवाओं की उम्मीदों से लवरेज है. वसंत युवाओं का मौसम है. युवावस्था के उत्सव का मौसम है." भारत की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवाओं का है जिनकी कोमल भावनाओं और भविष्य की उम्मीदों के साथ भारत की राजसत्ता खिलवाड़ कर रही है. एक ओर मुंबई में उत्तर भारतीय नौजवानों पर ठाकरे खानदान हमला कर रहा है. राहुल राज का फर्जी एन्काउन्टर हुआ. वहीं बुजुर्गो के नेतृत्व वाला संघ संप्रदाय वैलेन्टाइन डे या मंगलोर में पब में युवतियों की भागीदारी के खिलाफ हिंसक अभियान चला रहा है. संघ संप्रदाय को यह एहसास है कि भारत के युवाओं की उम्मीदें और सपने संघ के दृष्टिकोण से मेल नहीं खाते. इसी काशी में रहते हुए महाकवि जयशंकर प्रसाद ने लिखा था -
काम मंगल से मंडित श्वेय सर्ग, इच्छा का है परिणाम;
तिरस्कृत कर उसको तुम भूल बनाते हो असफल भवधाम.
जाहिर है कि प्रसाद जी प्रेम की इच्छा को सृष्टि के मंगल का उदगम मानते थे. आज संघ परिवार युवाओं की प्रेम भावना के खिलाफ है. हमला बोलकर सृष्टि और संस्कृति पर ही हमला कर रहा है. इस हमले का सृजनात्मक प्रतिरोध युवावर्ग का दायित्व है.
गोविन्दाचार्य चिल्लाते रह गए लेकिन संघ ने राजग सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था और कानूनी ढ़ांचे के अमेरीकीकरण का अनुमोदन करना नहीं छोङा. अमरीकापरस्त संघ परिवार विदेशी पूंजी के साथ गठजोड़ को छिपाने और देशी दिखने की खातिर वेलेन्टाइन डे पर हमले जैसे प्रतीकात्मक, हिंसक कार्यवाई कर रहा है. वह चाहता है कि युवा प्रेम न करें बल्कि नफरत करना सीखें, धर्मस्थल तोड़े, उड़ीसा और गुजरात जैसे जनसंहारों का हिस्सा बनें. यही युवाओं के लिए उनका कार्यक्रम है. इसका पुरजोर प्रतिरोध युवा ही करेंगे.
संस्कृति का क्षेत्र उदान्त होता है. अच्छे विचार और भावनाएं हर कहीं से ली जा सकती है. वेलेन्टाइन का नाम पश्चिमी है लेकिन उस संत ने प्रेम की जिस भावना का संदेश दिया वह सार्वभौम है. इसी तरह बसंत ऋतु और यौवन भी सभी संस्कृतियों का हिस्सा है. प्रसाद जी ने चंद्रगुप्त नाटक में यूनानी और भारतीय इन दो युद्धरत कौमो के बीच सामंजस्य और प्रेम का रिस्ता कायम कराया है. चंद्रगुप्त का विवाह यूनानी सुंदरी कार्नेलिया से कराया है. क्या संघ वाले प्रसाद से ज्यादा भारतीय संस्कृति जानते है ?
आज की कला प्रदर्शनी बनारस में स्पदित बहु-सांस्कृतिक भारत उसके सामान्य नागरिक, स्त्रियों और बच्चों की उम्मीदों और सपनों को अभिव्यक्त करती है.

Wednesday, February 25, 2009

"अस्सी पर छायी उम्मीदें 2009"

शहर के युवा कलाकारों की संस्था 'कला कम्यून, क्राफ्ट' द्वारा दो दिवसीय उम्मीदें 2009 कला उत्सव सम्पंन हुआ. उत्सव पर कलाकारों ने घाट को झंडे-पतंगी और कलाकृतियों से सजा दिया . चारों ओर रंग-ही-रंग बिखरे थे.... बसंत सा माहौल था.
कला उत्सव में सबसे पहले कलम और कूंची के सिपाही स्व. सुशील त्रिपाठी को अश्रूपुरित श्रध्दांजलि दी गई. दो मिनट का मौन रखा गया. इस वर्ष उत्सव को स्व. सुशील जी के विरासत के रूप में मनाया गया. इसी अस्सी पर सुशील जी ने इंदिरा गांधी के इमरजेंसी के खिलाफ सड़क पर पोस्टर प्रदर्शनी की शुरूआत की थी. सत्ता के खिलाफ उनकी मुहिम 'प्रतिशोध के खिलाफ प्रतिरोध का सृजन' उम्मीदें 2009 कला उत्सव के रूप में निरंतर जारी है. कला उत्सव का उद्घाटन स्मृति स्तंभ जिसे आम आदमी के प्रतिरोध के रूप में बनाया गया , उस पर गुब्बारा उड़ाकर जन संस्कृति के महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया. कला उत्सव में इस वर्ष पूर्वांचल के विभिन्न हिस्सों के साथ ही उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के कलाकारों की भागीदारी रही. छत्तीसगढ़ के राजेन्द्र ठाकुर ने लाल कुर्सियों से भव्य इन्सटालेशन किया. वेलेन्टाइन डे पर प्रेस के पक्ष में उनकी यह कृति कुर्सियों के संयोजन में जीवन के उतार-चढ़ाव का संजीदा प्रदर्शन थी. कलाकृतियों में जीवन के विभिन्न पक्ष दिखें.
इसबार उत्सव में विशिष्ट कवियों की कविताएं भी शामिल की गई है, दिनेश कुमार शुक्ला, "धूमिल - और जो चरित्रहीन है, उसके रसोई में पकने वाला चावल कितना महीन है", "कैफी आजमी - इक कदम जो बढ़ता है तू मंजिल की तरह, इक दिया और सरे राह आलम जलता है" साथ ही नज़र कब्बानी, नावारुण भट्टाचार्या, मंगलेश डबराल आदि कवियों की पोस्टर लगे.
कला उत्सव की एक खासियत सांस्कृतिक कार्यक्रम भी रहा. पटना की मशहूर नाट्य टीम हिरावल ने जहां अपने जनगीतों से क्रांतिकारी चेतना के साथ सत्ता पर करारा व्यंग्य किया वही लोकगीतों से लोगों को उनकी ताकत का अहसास कराया.
उम्मीदें 09 कला उत्सव के दूसरे दिन भी विदेशी और शहर के लोगों का तांता लगा रहा. इस वर्ष उम्मीदें 09 कला उत्सव में 10 शीर्ष सम्मान दिया गया इसमें बनारस को 5, छत्तीसगढ़ 2, उङीसा 1, फैजाबाद और दिल्ली के कलाकारों को 1-1 सम्मान मिला. यह सम्मान चित्रकला, मूर्तिकला, छायाचित्र, ड्राइंग, और इन्सटालेशन कृतियों में दिया गया. मूर्तिशिल्प में स्मृति ने बिल्ली की आकृति को गढ़ा है जो हमारी जीवों के प्रति संवेदना का ....ओतक है. प्रकृति के नष्ट होने के साथ जहां एक ओर मौसम प्रभावित हो रहा है. वही जीव जगत पर असर पङ रहा है. मुर्तिशिल्प में प्रशान्त कु. विश्वकर्मा ने इन्हीं भावनाओं को गढ़ा है. लाल कुर्सियों से संयोजन कर छत्तीसगढ़ के राजेन्द्र ठाकुर व धनंजय पाल ने कुर्सी के खेल को दिखाया है. इसमें प्रेम और घृणा की संवेदना को पकङा है जिसमें पानी के अभाव के बीच जलती लौ का छायांकन है. ड्राइंग में उत्कर्ष आनंद ने अक्षशंकण के माध्यम से बनारस की छवि पकङी है यह एक अनूठा प्रयोग है.
चित्रकला में दिल्ली के रंजित सिंह की पेन्टिग ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा. इसमें चाय वाला बच्चा केतली के साथ ध्यान की मुद्रा में है. छत्तीसगढ़ की पिनाकी मुखर्जी ने "सौ-सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज करने" का पोट्रेट किया. उड़ीसा के श्रीमन अंशुमन ने नारी जीवन के संघर्ष और विद्रुप स्थिति को चित्रित किया. वाराणसी के अहसान एम. रिजवी ने भी नारी की एक संवेदनशील सौन्दर्य को पकङा है. "उम्मीद" जिसपर दुनिया कायम है. कला उत्सव के सांस्कृतिक संध्या में, क्राफ्ट की नाट्य एवं गायन इकाई "दस्ता" द्वारा गीत और नाट्क "मास्टर-माइंड" का मंचन किया गया. और अवधेश ने बुश को पड़े जूते पर कविताओं का पाठ किया.
कलाकारों को सम्मान पत्र क्राफ्ट के अध्यक्ष वी. के. सिंह और समकालीन जनमत के प्रबंध संपादक के. के. पाण्डेय द्वारा दिया गया. धन्यवाद ज्ञापन में कला कम्यून के संयोजक अर्जून ने अस्सी वासियों का धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की.

Thursday, February 5, 2009

प्रतिक्रिया और प्रतिशोध के खिलाफ प्रतिरोध का सृजन




उम्मीदें 2009

साल 2008 प्रतिक्रिया और प्रतिशोध से, लहूलुहान
मुम्बई के महासमुद्र में दूब गया
प्रतिक्रिया और प्रतिशोध
जिसे आदमी के जिन्दा होने और सोचने पर एतराज है
जिसे बच्चों के मुस्कुराने और फ़ूलों के खिलने पर एतराज है
जिसे कब्रों और श्मसानों में जिन्दगी की आहट से खतरा है
जिसे आज गर्भ में आकार ले रहे कल की कुल्बुलाहट से खतरा है
इसलिए वह मिटा देना चाहता है समय और सोच को,
सपनों और संभावनाओं को डालरों और दलालों से,
मुस्कुराहटों को मिसाइलों से और प्रतिरोध को प्रतिशोध से
वह बना देना चाहता है आदमी को
धौस-धमक से कूट-पीट कर, नर्म और नाकारा-पिलपिली लुग्दी
जिससे वह बना सके व्यवस्था के मनचाहे पुर्जे,
मनचाहे मुखौटों वाले दलाल गुड्डे
जो व्यवस्था की बिसात पर शातिर चालों का मोहरा बन सकें।
लेकिन गजब हो गया
वक्त ने रुकने और आदमी ने मरने से इन्कार कर दिया
और साल 2009 में प्रतिरोध का सूरज
प्रतिक्रिया और प्रतिशोध से लड़ता गाजा-पट्टी की सडकों पर निकल आया
जिंदा होने की जिद की कीमत
जन्मे-अजन्मे बच्चों के चीथड़े हो गयें।

इसलिए बेहद जरूरी है कि आदमी प्रतिरोध का परचम बुलन्द करे,
और जो कुछ भी हो हाथ में,
कलम, कूंची, कूदाल, फूल, पत्थर या जो भी,
उसे हथियार बना, प्रतिरोध के सृजन में शामिल हों
अहमद फ्राज की कविता, मंजीत बाबा के चित्रों
और सुशील त्रिपाठी के सृजन धर्मिता के वारिस हों।

उम्मीदें 2009 प्रतिक्रिया और प्रतिशोध के खिलाफ
प्रतिरोध के सृजन के नाम है

आप जरूर शामिल हों।

Thursday, September 4, 2008

आदिम लय - 6
आदिवासियों में 'जनी शिकार' नाम से उत्सव मनाने की परम्परा चली आ रही है, इस दिन महिलाएं पुरुषों के वेश में शिकार पर जाती हैं, उक्त मूर्तिशिल्प इसी पृष्ठभूमि पर आधारित है.
महिला का दायां हाथ खुद तीर बन गया है जो इस व्यवस्था के प्रति घोर आक्रोश का प्रतीक है ऊपर की ओर लहराते हुए बाल नारीशक्ति, नारी तेवर का प्रतीक है. साथ-साथ मदिरा की हांड़ी को ऊर्जा के रूप में रूपायित किया है.

व्यंग्यात्मक रचनाएं
समकालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थियों के ऊपर केन्द्रित थी. 'डेमोक्रेसी' प्रथम एवं द्वितीय को जनता ने काफ़ी सराहा, दोनों कृतियों को साउथ सेण्ट्रल जोन नागपुर में दो बार क्रमश: जूनियर एवं सीनियर श्रेणी में सम्मानित किया गया.

रामकिंकर मेरे प्रेरणाश्रोत

मूर्तिकार कलागुरू श्री रामकिंकर बैज का आदिवासियों के जीवन पर आधारित सारी कलाकृतियां व उनका व्यक्तित्व मेरे प्रेरणाश्रोत है.
'आदिम लय' शीर्षक के तहत की गयी मेरी कलाकृतियां उम्मीदतन बेसुरे हो रहे इस समाज को एक नया सुर-लय-ताल देने में सक्षम होंगी.

Monday, September 1, 2008

सप्ताह का कलाकार -'मनोज कुमार पंकज'


बिहार के मधेपुरा जिले के गंगापुर गांव में मेरा जन्म हुआ. भागलपुर जिले के अति पिछड़े इलाके, एकचारी दियारा में पला बढ़ा, "संथाल जन-जाति का जीवन" बचपन से ही मेरे अंदर एक जबरदस्त रहस्यबोध, आकर्षण और रोमांच पैदा करता रहा. मेरे पिताजी का बड़ा योगदान है, मेरी कला यात्रा को आगे बढाने में. जब जी ऊब जाता तो पिताजी मुझे चित्र बनाने व कविता लिखने के लिए प्रेरित करते. तीन वर्ष की छोटी आयु से ही मैंने अपने-आपको रंगमंच पर पाया. पहला अभिनय कब और कहां किया था, ठीक-ठीक याद भी नहीं है. पांचवी कक्षा से ही बाल नाट्य मंडली का अघोषित रुप से निर्देशक बन गया. जनपद की आंचलिक भाषा 'अंगिका' में नाटक और कविताएं लिखना प्रारंभ कर दिया. छोटे-बड़े दर्जन भर नाटकों का गांव-गांव तकरीबन बिहार के सौ से ज्यादा जगहों पर मंचन किया. 19 वर्ष की आयु में अंग जनपद का लेखक व निर्देशक घोषित हो गया. 'अंगिका' भाषा का प्रथम नाटककार होने का गौरव प्राप्त हुआ. 'बिहार-दलित साहित्यकार अकादमी ने 'डॉ. अंबेडकर फ़ेलोशिप' देकर सम्मानित किया. इन्टर की पढा़ई के तुरंत बाद शिल्प, संगीत, नृत्य महाविद्यालय कलाकेन्द्र, भागलपुर से फ़ाइन आर्ट की प्रारंभिक कला शिक्षा की शुरुआत की.
कला केन्द्र में बचपन से अवचेतन में बसा देवदूत (संथाल आदिवासी) कोरे कागज पर तीर धनुष लिए उपस्थित हो गया.

संथाल आदिवासी एक दाम्पत्य जीवन
यह मेरा पहला तैल चित्र जो 1993 में बनाया,जिसे प्रथम राज्यस्तरीय पुरस्कार मिला.

बी.एच. यू में प्रवेश
बी.एच. यू में आते ही संघर्ष का दौर शुरु हो गया. बी.एच. यू प्रशासन ने प्रवेश परीक्षा रद्द कर दी.इसके खिलाफ़ हम लोगों ने अपने प्रवेश के लिये आंदोलन छेड़ दिया. इलाहाबाद हाई कोर्ट से 6 महीने तक केस लड़ने के बाद जीत हमारी हुई.
इस संघर्ष ने मेरे विचारों व्यवहारों व जीवन मूल्यों में बड़ा परिवर्तन किया. जो लोग यह उपदेश देते फ़िर रहें थे कि राजनीति गन्दीं चीज है इससे कलाकारों को बचना चाहिए. वही लोग सबसे घिनौनी राजनीति कर रहे थें.

रचना और आंदोलन
बी.एफ़.ए की पढ़ाई करते हुए कई अनसुलझे सवाल थें जैसे ......................... कला आखिर किसके लिये हो...... इसकी सेवा कैसे की जाए ?
इसी क्रम में 'जसम' के वरिष्ठ रंगकर्मी 'उदय' एवं 'समकालीन जनमत' के सम्पादक 'रामजी राय' से मुलाकात हुई . मेरे सवालों का जवाब मिल चुका था, रास्ता साफ़ दिखाई दे रहा था. बस सिर्फ़ चलने की जरुरत थी.

जीवन, रचना और आंदोलन
छात्र आंदोलन से उभरे कई कलाकार साथियों ने मिलकर 'कला-कम्युन' नाम से संस्था बनाई अब जीवन रचना और आंदोलन एक दुसरे के पर्याय बन गएं. जो आज कई वर्षों से जनता के बीच सांस्कृतिक गतिविधियां कर रही है. जो आज भी मुझे ऊर्जा प्रदान कर रही है.
माध्यम और रचना को लेकर मेरे विचार
मैं रचना के आधार पर माध्यम का चुनाव करता हुं न कि माध्यम के आधार पर रचना का.

मेरे मुर्तिशिल्प
आदिम लय-1 >
उक्त रचना में मैंने श्रम की गति, लय, सौन्दर्य, वात्सल्य और बाल हट दिखाने के साथ-साथ आदिम संस्कृति की अमर परम्परा को अक्षुण रखने हेतु नयी पीढ़ी के दायित्व का इशारा भी है.
आदिम लय-2
मदीरा पान आदिम संस्कृति का बहुत ही महत्त्वपुर्ण अंग है. उक्त रचना में मैंने मदीरा पान को positive sence में लिया है रचना के किसी उक्त भाव, लय, गति व मस्ती को दिखाने के लिए फ़ार्म के साथ प्रयोग किया है.
आदिम लय-3
उक्त रचना में श्रम करने जा रही दो आदिवासी युवतियों के माध्यम से श्रम के सौन्दर्य को ज्यादा मुखर दिखाने का प्रयास किया है.चेहरे पर आशा का भाव हाथ में आगे की ओर लहराते हसिया व खुरपी के माध्यम से अपने अधिकारों के प्रति लड़ने की तरफ़ एक इशारा है.
आदिम लय-4
उक्त रचना में श्रम, शिकार, संगीत और प्रेम को प्रकृति के साथ तादात्म स्थापित कर आदिवसियों के जीवन की वास्तविकता को समाज के सामने रखने का प्रयास किया है.
आदिम लय-5
उक्त रचना में श्रम-शिकार और संगीत में तादात्म स्थापित कर आदिम संस्कृति की आत्मा को छूने का प्रयास किया है.

क्रमश:

Friday, March 7, 2008

हमारा सृजन संघर्ष जारी है

मनोज कुमार पंकाज
जेहन में हो अ़गर अतीत की गर्माहट
मालूम हो बहुरुपिया वर्तमान का सच
ठीक-ठीक पता हो
समय का साइन्स
अंतडियों में खौलती मैग्मा का सेन्टर
और कर ली गई हो
रोटी पर कील ठोंकने वालों की शिनाख्त
तो बदला जा सकता है-
हवा का रूख
रोकी जा सकती है सूरज की मनमानी
चांद की बेवफाई
उठ सकता है
कलम-कूंची से भी तूफान
फूट सकता है ज्वालामुखी
बदल सकती है औरत की परिभाषा
क्योंकि उसकी कोख में पल रहा है
तुम्हारे कंप्यूटर युग का भगत सिंह.
नये साल के स्वागत में मुक्ति की अदम्य आकांक्षा लिये 'उम्मीदें २००८' नई रचना और नये सृजन की पुरसुकून आह्ट ले कर आई .
कला और संस्कृति की राजधानी बनारस में 'उम्मीदें' कला महोत्सव का आयाम लेती जा रही है. यहाँ कला दीर्घा के दायरों से निकल कर कला अपना मुक्ताकाशी विस्तार तलाशती है. यहाँ रचना और रचनाकार अपने अस्तित्व का अर्थ तलाशते हैं और इसके लिए कला-प्रेमी-पारखी आम जन से सहज संवाद बनाते हैं.
बनारस में कला की हर विधा-साहित्य, संगीत, नाटक, चित्र व मूर्ति कला के प्रति जो बनारसी लगाव, समझदारी, और आत्मीय ग्राह्मता है, वह दुर्लभ है. कला के प्रति लगन और लगाव की इस संस्कृति को विकसित करने में काशी के कलाकारों की सदियों से चली आ रही अनवरत साधना की अहम भूमिका रही है. 'उम्मीदें' काशी की इस विरासत को आगे ले चलने का समवेत प्रयास है.
संचार माध्यम नयी पीढी़ के लिये हर पल बदलती रंगीन रोशनी और गहराते उन्माद के जहरीले धुएँ की ऐसी डिस्को दुनिया परोस रहे हैं जहाँ किसी भी चीज की हैसियत, उसका वजूद सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका बाजार भाव तय करता है. किसी भी 'चीज' से मतलब इन्सान समेत हर उस चीज से है जो इन्सानी उपलब्धि और कल्पना के दायरे में है. कला और संस्कृति इससे अलग नहीं है. आज का कलाकार भी उपभोग के इस माया बाजार में बिकने के लिए मजूबर है. इस बाजार में कला और हुनर की कीमत रचना के सौन्दर्य और अन्तर्वस्तु से नहीं बल्कि कलाकार के नाम के टैग से होती है. कला और रचना से परे कलाकार खुद एक 'ब्रांड'- एक स्टेट्स सिंबल, एक कारपोरेट एन्टिटी बन जाता है. कला और कलाकार का संपूर्ण बाजारू पर्याय जिसके सामने लाखों कलाकार और उनकी रचना अपने अस्तित्व और अस्मिता से वंचित हो जाते हैं- ठीक उसी तरह जैसे आज की सत्ता के लिए बाजार के दायरे से बाहर कोई भी इन्सानी वजूद नहीं हैं- भले ही उनकी तादाद अरबों में क्यों न हो.
'उम्मीदें कला और कलाकार की इस मजबूरी को नये सृजन की चुनौती है. इसके लिए हर कला विधा से जुडे़ रचनाकार को अपने आप से लड़ना होगा. पराभव के अहसास और मोहग्रस्तता को बेरहमी से तोड़ना होगा. अपने अन्दर के जुझारू, बेपरवाह कलाकार को मुक्त करना होगा.
'उम्मीदें' तमाम कला विधाओ के सृजन और सृजनकारों को साझी जगह और जरूरत से जोड़ने की कोशिश है जिससे वे एक दूसरे को समृद्ध करते हुए आम जन की दुनिया से जुड़ सकें जहाँ उनके वजूद की जमीन और विस्तार का अनन्त आकाश दोनों ही हैं.
फ़ितरत हमेशा ही अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने की रही है और सच्चे रचनाकार सत्ता की चुनौतियों से हमेशा ही दो-दो हाथ करते हुए रचना को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते आये हैं. इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाते रहे हैं. कोई भी कीमत चुका कर अभिव्यक्ति और सृजन के खतरे मोल लेने का हौसला ही गुयेर्निका की चीख, गुरूशरण के नाटक और गदर के गीत रचता है.
हमारे देश का सत्ता प्रतिष्ठान भी अभिव्यक्ति पर पाबन्दी और पहरे के उन्मअत्त और उदंड प्रयास करता रहा है. साल २००७ भी इसका अपवाद नहीं रहा. हुसैन के साथ जो हुआ उसे कौन नहीं जानता. बडौ़दा के युवा चित्रकार की पेन्टिंग प्रदर्शनी में तोड़-फोड़ और दुर्व्यवहार समूचे रचनाधर्मी समुदाय के लिए बेहद शर्मनाक घटना थी जिसका देश भर में कवि-कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने विरोध किया. मगर अफसोस कि बनारस में दो बडे़ कला संस्थान होने के बावजूद इस लम्पट उदंडता के खिलाफ कोई संगठित आवाज नहीं उठ सकी.
निर्वासन की त्रासदी झेल रही, महिला मुक्ति की हौसलाकुन आवाज, बंगलादेश की मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन को पनाह देने में हो रही सियासत और बीते दिनों उनके साथ हुए दुर्व्यवहार ने सत्ता प्रतिष्ठान के दलाल और लम्पट चरित्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है. मगर एक बार फिर अफसोस कि इस बार इस सवाल से देश के ज्यादातर रचनाकार-बुद्धिजीवी कतराते नजर आ रहे हैं. चुनौतियों से कतराने का यह शुतुरमुर्गाना अन्दाज अभिव्यक्ति और सृजन की स्वतंत्रता पर सत्ता के हमले रचना का वाक-ओवर तो नहीं है?
कतराना न तो सृजन की परम्परा रही है और न ही सृजनकार की फितरत. सृजन के खतरे मोल लेने का हौसला तभी आता है जब सृजनकर्ता आम आदमी की मुक्ति की अदम्य आकांक्षा से जुड़ता है. मुक्ति की वह अदम्य आकांक्षा जो बनारस के नाविक को, पूर्वांचल के बुनकर को, महाराष्ट्र और आंध्र के किसान को, गुड़गांव के मजदूर को, बेरोजगार नौजवान को, बलात्कृता औरत को, सिंगूर और नन्दीग्राम को, भुखमरी, उपेक्षा, प्रताड़ना और दमन की दहलीज पर घुटने टेकने से रोकती है. मुक्ति की यह अदम्य आकांक्षा ही नये सृजन की आशा है.
उम्मीदें २००८ नये सृजन की इसी आशा की ओर हम सृजनकारों का हौसले के साथ बढ़ाया गया कदम है.

Saturday, December 22, 2007

..आप क्या सोचते हैं कि कलाकार क्या है? क्या वह कोई मंदबुद्धि व्यक्ति है

कला और उसके रचना संबन्धों के बारे में पाब्लो पिकासो के विचारों का एक कोलाज


कला को क्यों समझें
.....हर कोई कला को समझना चाहता है। कभी हम चिड़िया के गाने को समझने की कोशिश करते हैं। हम रात से, फूलों से और चारों ओर की हर चीज़ से क्यों प्रेम करते हैं? लेकिन जब पेंटिंग की बात आती है तो लोग उसे समझना जरूरी मानते हैं। काश वे पहचान पाते की आखिर कलाकार अपनी अनिवार्यतावश ही काम करता है, कि वह खुद इस संसार का एक मामूली-सा हिस्सा है, और यह कि उसे संसार की उन दूसरी चीज़ों के मुकाबले कोई ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, जो हमें अच्छी लगती हैं, हालाकि हम उनकी व्याख्या नहीं कर पाते।
.....लोग अब भी आधुनिक कला को नहीं समझते, लेकिन इसमें न कालाकार का दोष है न लोगों का। इसका कारण यह हैं कि उन्हें कला के बारे में कुछ नहीं सिखाया गया है, लेकिन यह किसी को नहीं सूझा कि लोगों को पेंटिग को देखना भी सिखाया जाये। मसलन यह कि शायद यह रंगो की शक्ल में कविता है, या किसी फार्म या लय का जीवन हो सकता हैं। कुल मिलाकर वे रुपंकर कला की मूल्यवत्ता से पूरी तरह अनजान हैं। (1946)

कला और प्रकृति
.....प्रकृति और कला दो भिन्न चीजें होने के कारण कभी एक चीज नहीं हो सकती। कला के माध्यम से हम अपनी यह अवधारणा व्यक्त करते हैं कि प्रकृति में क्या नहीं है। (1923)
.....प्रकृति एक चीज़ है और पेंटिग एक बिल्कुल दूसरी चीज़। पेंटिग, प्रकृति के बराबर हैं। हमें प्रकृति का बिंब देने के लिए कलाकारों का आभारी होना चाहिए। हम प्रकृति को उनकी आंखों से देखते हैं।

रेखांकन
.....अगर रेखाओं और आकारों का तुक मिल जाये और वे सजीव हो उठें तो यह कविता जैसा होगा। इसे हासिल करने के लिए बहुत ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी बहुत लंबी कविता की बनिस्पत दो या तीन पंक्तियों में ही कहीं ज्यादा कविता संभव हो जाती है। (1946)
.....जो मैं कर रहा हूँ वह जब मेरे बगैर अपनी स्वतन्त्र बात करने लगे तो समझिए मैं जीत गया। और मेरे ख्याल से मैंने फिलहाल जो पाया है वह इतनाभर है कि मैं रेखांकन की कला में एक कारीगर की अवस्था से आगे चला आया हूं। जब ऎसा होता है कि मैं बोलना बंद करता हूँ और मेरे बनाये रेखांकन ही बोलने लगते हैं और वे मुझसे दूर चले जाते हैं और मेरा उपहास करने लगते हैं तो मुझे लगता है कि मैंने अपना लक्ष्य पा लिया है। (1956)
.....विचार सिर्फ प्रस्थान बिंदुओं की तरह हैं। वे जब दिमाग में आते हैं तो मैं कभी-कभार ही उन्हें पकड़ पाता हूँ। मैं जैसे ही काम करने बैठता हूँ, कलम से दूसरे विचार निकलने लगते हैं। जब एक खाली कागज मेरे सामने होता है तो वह हमेशा दिमाग में घूमता रहता है। इस मामले में मेरी इच्छा जो भी हो, अपने विचारों से ज्यादा दिलचस्प मुझे वह लगता है जो मैं व्यक्त कर रहा हूँ। (1966)

रंग
....फिलहाल रंगों में मेरी दिलचस्पी कम ही है, गुरुत्व में ज्यादा है, और सघनता की तो बात ही क्या है। (1956) आकृतियों की ही तरह रंग भी संवेगों के अनुरूप बदलते रहते हैं।

संग्रहालय
.....संग्रहालयों में ऎसी ही कलाकृतियां होती हैं जो नाकाम रही हों। .....क्या आप हँस रहे हैं? ज़रा सोच कर देखिये और आप समझ जायेंगे कि मैं सही कह रहा हूँ या गलत। आज हम जिन्हें 'मास्टरपीस' कहते हैं, वे सभी कृतियाँ उस दौर के मास्टर्स के बनाए हुए नियमों को तोड़कर बनाई गई थीं। बेहतरीन काम वही है जो साफ-साफ उस कलाकार के किसी ’दोष’ की जानकारी देता हो। (1948)
......अगर आप किसी कलाकृति को नष्ट करना चाहें तो आप कुछ नहीं बस इतना कीजिए कि उसे एक कील पर खूबसूरती से टांग दीजिए और तुरन्त ही आपको उसके फ्रेम के अलावा कुछ नहीं दिखाई देगा। कला को तभी बेहतर देखा जा सकता है जब वह अपनी जगह पर न हो। (1958)

राजनीति
.....आप क्या सोचते हैं कि कलाकार क्या है? क्या वह कोई मंदबुद्धि व्यक्ति है जो अगर पेंटर है तो उसके पास सिर्फ आंखें होंगी, अगर संगीतकार है तो उसके सिर्फ कान होंगे या अगर कवि है तो उसके दिल के हर कोने में एक वीणा बज रही होगी, और यहाँ तक कि अगर वह बाक्सर है तो उसके पास सिर्फ कुछ मांसपेशियां होंगी? नहीं, इसके ठीक उल्टा है। वह पेंटर होने के साथ ही एक राजनैतिक प्राणी है जो दुनिया की भयावह, प्रेमपूर्ण या खुशनुमा घटनाओं के प्रति सतर्क है और लगातार उनके रूपरंग में अपने को ढालता रहता है। यह कैसे मुमकिन है कि आप दूसरों से सरोकार न रखें? किस ठंढी उदासीनता से यह संभव है कि आप अपने को उस जीवन से काट कर रखें जो इतने विपुल स्तर पर आप तक पहुँच रहा है? नहीं, पेंटिंग घरों को सजाने के लिए नहीं है। यह शत्रु के खिलाफ एक आक्रामक और एक रक्षात्मक हथियार है।(1945)
.....हम कलाकार अविनाशी हैं, जेल में भी और यातना शिविरों में भी। मैं अपने कला संसार का खुदा रहूँगा ही, भले ही मुझे काल कोठरी में अपनी गीली जीभ से धूल भरे फर्श पर पेंटिंग करनी पड़े।(1949)

(डोरे एश्टन द्वारा संपादित पिकासो के विभिन्न इंटरव्यू, लेखों और वार्ताओं के चयन की अंग्रेजी पुस्तक "पिकासो आन आर्ट" का मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित संकलन से साभार चयनित अंश)

Tuesday, December 18, 2007

महा कवि का महाप्रयाण -२

अजय कुमार

सुनने पढ़ने में सतर्क थे। एक बार विषय ठीक से पता न होने के कारण मैंने उर्दू कविता में सामाजिक बदलाव के बदले उर्दू कविता का इतिहास ही लिखमारा। एक साथी ने कमेंट किया "अजय जी बदलाव की चर्चा करने के बजाय इतिहास ही लिख लाये"। अध्यक्षीय वक्तव्य में त्रिलोचन जी ने कहा, " आधार पत्र में तमाम कवियों के संदर्भ सामाजिक बदलाव के ही संदर्भ हैं। लगता है आपने ध्यान से नहीं सुना है।" जाहिर है त्रिलोचन जी ने ध्यान से सुना था। एक गोष्ठी में मिलते ही कहा, "वामिक साहब की आत्मकथा 'समय' के हर अंक में नहीं छाप रहे हो।" मैंने कहा, "नहीं हर अंक में छ्प रही है।" जौनपुर लौटकर कन्हैया, जिस पर अखबार छ्पवाने की जिम्मेदारी थी, जिक्र किया तो उसने कहा, "ठीक कह रहे थे, एक अंक में नहीं जा पाई थी।" यानी 'समय' ध्यान से पढ़ते थे और आत्मकथा का लगता है इन्तज़ार करते थे।

लखनऊ के दलित साहित्य सेमिनार के मौके पर मुझे त्रिलोचन जी के साथ उस कमरे में ठहरने का सौभाग्य मिला जिसे दिन में कामरेड विनोद मिश्र ने खाली किया था (अपनी लुंगी भी वे खिड़की पर टंगी हुई भूल गये थे)। तब तक सर्दी बाकायदा शुरु नहीं हुई थी लेकिन गेस्ट हाउस लान के बीच और नहर के किनारे होने के कारण कमरा ख़ासा ठंडा था। सोने के लिये त्रिलोचन जी ने अपनी ऊनी चादर निकाली और मेरे पास कुछ न देखकर सलाह दी कि दरवाजों के पर्दे उतार लीजिये। मैंने कान नहीं दिया और एक रिश्तेदार के लिये भिजवाई आशा की साड़ियाँ ओढ़कर सो गया। रात ऎसी गुज़री कि अब भी याद है। और उनकी नेक सलाह भी "पर्दे उतार लीजिये"।

सेमिनार के बाद अतिथिगृह जाते हुए टेम्पो में मेरी किसी बात पर बोले, " आपसे कौन जीत सकता है? आप तो अजय हैं।" मैंने कहा अजय माने तो हुआ जिसकी जय न हो। बोले, "नहीं जिसको जीता न जा सके।" और मानस की एक अर्ध्दाली सुना दी "जीत सकै को अजय रघुराई"। फिर बताया, "जाट कोई एक जात नही है। सभी जाति के लड़ाकुओं को मिलाकर बनी जात है।" प्रमाण पेश किया - "अवधी में जाट का अर्थ होता है लड़ाकू। कहते हैं फलनवा बड़ा जट्ट आदमी है"। यानी वे सिर्फ मुझे, भाई और पिता को ही नहीं जानते थे; खानदान की खबर भी रखते थे।

वहीं अतिथिगृह के भोजनकक्ष में डोंगों और प्लेटों के आदान-प्रदान के बीच किसी ने हरी मिर्च की प्लेट मेरी तरफ बढ़ाई-"क्या आप इसे लेना पसन्द करेंगे?" मेरे मुँह से निकला- "मैं उसे देखना भी पसन्द नहीं करता।" बातचीत के दौरान खाने-पीने की चीजों में औषधि गुणों की बात आ गई। त्रिलोचन जी आदत के अनुसार कोर्सेस में लंच ले रहे थे यानी दाल रोटी सब्जी बारी-बारी से निपटा रहे थे। बिना दाहिने बायें देखे बोले, "जिसे अजय जी देखना भी पसंद नहीं करते उसमें भी अनेक औषधि गुण हैं। इलाहाबाद में राष्ट्रीय परिषद की बैठक के दौरान जब हमलोग नर्मदेश्वर जी के यहाँ से खाना खाकर आ रहे थे त्रिलोचन जी एक पेड़ के पास ठिठ्क गए। बोले, "यह बकाइन है, भैषजशास्त्र में इसे महानीम कहते हैं। इसमें बड़े औषधि गुण होते हैं।" उनके इस गुण के बारे में अवधेश जी से सुन चुका था। कितने ही अनाम पेड़ पौधों के नाम उन्हें उनसे पता चले थे। कितने ही फूलों के संस्कृत नाम भी। वे माटी से जुड़े निहायत ज़मीनी आदमी थे। तभी माटी की गंध से सुवाषित ऎसी अमर रचनाओं का भण्डार छोड़ गये हैं वे अपने पीछे। और भी उस दौर में जब हिन्दी कविता आयातित विचारों से इस कदर आक्रांत थी। अच्छे-अच्छे विदेशी मुहावरों का अनुवाद कर रहे थे नये के नाम पर।

अपने पिता की जन्मशताब्दी की अध्यक्षता करने के लिए मैंने उन्हें आमंत्रित किया। जवाब आया- " आप बुलायें और मैं न आऊँ यह कैसे हो सकता है।" इस अवसर पर पिता के तीन कर्मक्षेत्रों - स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता और साहित्य पर सेमिनार हुए और इन तीन क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए तीन लोगों को "समय सम्मान" से सम्मानित किया जाना था। साहित्य के लिये त्रिलोचन जी को चुना गया था। सम्मान समारोह शुरु होने के पहले वे बोले, " आप का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ अब मुझे छुट्टी दीजिये तो ए.जे. पकड़ कर निकल जाऊँ और एक दिन इलाहाबाद भी रुक लूँ।" तब तक सम्मान पत्र फ्रेम होकर नहीं आ पाये थे। मैंने माला और शाल से सम्मान की औपचारिकता पूरी करके उन्हें विदा किया। थोड़ी ही देर में सम्मान पत्र भी फ्रेम होकर आ गया तो भागकर स्टेशन पहुँचा। प्लेटफार्म नम्बर दो पर इलाहाबाद जौनपुर पैसेन्जर का इन्तज़ार करते हुए त्रिलोचन जी एक बेंच पर आसीन थे। मैंने सम्मान पत्र दिया तो रैपर का काग़ज़ हटाकर सम्मान पत्र को देखा और अटैची में रख कर बोले, " इसमें भी एक लतीफा है। जब कोई लिखना बन्द कर देता था तो हम लोग उसे महाकवि की उपाधि दे देते थे।" मैंने सम्मान पत्र में उनके नाम के पहले महाकवि लिखवा दिया था, जो वो थे भी।

एक लतीफा इसमें और रह गया। आशा जिसके सर पर उनके खाने-ठहरने का इन्तजाम था, उनके सहायक से पता करके सब कुछ ठीक ठाक निपटा दिया था। यहाँ तक कि थरमस में गरम पानी भी बिस्तर के सिरहाने रख दिया था। सुबह नाश्ते के लिए दलिया वगै़रह लेकर आयी तो पूछा, " आपको यहाँ कोई तकलीफ तो नहीं हुई?" वे लोगो से घिरे बतिया रहे थे, मुड़कर बोले, " जिसकी आप जैसी माँ हो उसे भला क्या तकलीफ हो सकती हैं।" आशा खिसिया गई, हो सकता हैं कोई हँस दिया हो। वहाँ क्या कहती मुझको पूरा वाक़या सुनाकर बोली, "तुम्हारे त्रिलोचन जी सठिया गये हैं क्या? भला मैं उनकी माँ जैसी लगती हूँ?" मैंने ठहाका लगाया तो और बौखला गई। मैंने दिलासा दिया, "माँ से उनका मतलब था माँ जैसी देखभाल करने वाला।" तब लगा जैसे उसे अपने किये का प्रतिदान मिल गया है।

Monday, December 17, 2007

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती

कवि त्रिलोचन शास्त्री की कविता-"चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती" के कुछ अंश

Saturday, December 15, 2007

महा कवि का महाप्रयाण -१

अजय कुमार


(हिन्दी की प्रगतिशील कविता की अंतिम कड़ी त्रिलोचन शास्त्री का 9 दिसंबर शाम उनके निवास पर निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। हिन्दी कविता के इतिहास में शमशेर, नागार्जुन, केदार और त्रिलोचन जी का अलग महत्व रहा है। इन्होंने हिन्दी में प्रगतिशील धारा को स्थापित किया। श्री शास्त्री जी का निधन हिन्दी की प्रगतिशील और जनपदीय चेतना की कविता के लिए बड़ी क्षति है। उनके निधन से एक युग का अंत हो गया। वह जनसंस्कृति मंच के पुर्व अध्यक्ष भी थे। बनारस के तमाम कलाकारों, साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों और जनसंस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। साहित्यकार अजय कुमार जी, जो सेवा प्रेस जौनपुर के रहने वाले तथा जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, त्रिलोचन जी के साथ बिताए कुछ छ्ड़ो को हमारे साथ याद कर रहे हैं)


आठवीं पार्टी कान्फरेन्स के लिए धनबाद ट्रेन पकड़ने के लिए हजारीबाग रोड से चली पैसेंजर ट्रेन के ठसाठस भरे डब्बे में कुछ देर खड़े खड़े द्रविण प्राणायाम करने के बाद जैसे ही कमर सीधी करने के लिए एक सीट का सहारा मिला और मैंने बैग से महाश्वेता देवी का "अमृत संचय" निकालकर बनारस में कर्नल नील के अत्याचारों के ब्योरे पर नज़र दौड़ानी शुरु की कि उदय ने भीड़ से सरक कर कन्धा थपथपाया और खबर दी - "त्रिलोचन जी गये"। उनकी पिछली बीमारी की खबर भी दिल्ली जाते हुए ट्रेन में मिली थी वाचस्पति जी से। स्मृतिलोप का पता "समयान्तर" में अजय सिंह के लेख को ट्रेन में ही पढ़ते हुए चला और अब उनके आखिरी सफर की खबर भी मिली सफर करते हुए।
तो इस तरह खतम हुआ संघर्षशील और सार्थक जीवन का एक लम्बा सफर। खबर के साथ शुरु हुआ मेरी यादों का सफर। बुकमार्क लगाकर किताब बैग में रख दी और मुड़ गया महाश्वेता देवी और नील के 1857 के बनारस से त्रिलोचन के बनारस की ओर। भाई (दम्मू जी) ने पहली बार उनसे मिलाया था "जनवार्ता" के कार्यालय में। वे कुर्ता खूंटी पर टांगकर खद्दर की बंडी और पायजामा पहने हुए मेज - कुर्सी पर डटे कुछ लिख रहे थे। तपाक से मिले। पिता के और समय (अखबार) के बारे में बात करते रहे। बातें क्या हुई कुछ याद नहीं। तब मै त्रिलोचन होने का मतलब ही नहीं जानता था। दूसरी मुलाकात भी डा. अवधेश प्रधान ने बनारस में ही कराई रथयात्रा चौमुहानी पर स्थित उनके घर पर। मेरा परिचय मिलते ही बड़ी आत्मीयता से पिता, भाई और अखबार के बारे में पूछा, "समय समय की बात समय पर मुझ तक नहीं पहुँच रही है आजकल" (भारत नीति गगन में निर्मल जीवन ज्योति जगावेगा / समय समय की बात समय पर "समय" आप बतलावेगा "समय साप्ताहिक" का आदर्श वाक्य हुआ करता था)। प्रधान जी और उनके बीच समाज, संस्कृति, इतिहास, भूगोल और भाषा पर लम्बी बातचीत होती रही। मैं दो महासमुद्रों के संगम पर बैठा सीपियां और कंकड़ चुनता रहा। मोती तो हमेशा ही निपुण गोताखोर को ही मिलते रहे हैं।

बनारस में ही एक मुलाकात और रही। लगता है अब "समय" उन्हे बराबर मिल रहा था। मिलते ही शिकायत की - " अपने भाई से कहना जैसे रामेश्वर बाबू जौनपुर और आसपास के गांव-जवार के कवियों की कविताएं छापते थे वैसे ही छापते रहें। क्रान्तिकारियों की कविताओं के अनुवाद दूसरों के लिए रहने दें।" इसी बनारस यात्रा में ठाकुर प्रसाद जी से मिला। त्रिलोचन जी की चर्चा पर बोले "जिस दिन चीनी क्रान्ति के विजय की खबर आई त्रिलोचन जी के इम्तहान चल रहे थे। हमलोग बड़ी सतर्कता के साथ उन्हे घेरे रहे कि कहीं वे पढ़ाई छोड़कर कविता लिखने में न जुट जायें। दूसरे दिन इम्तहान जाने के पहले वे लंगोट लेकर ऊपर गए कसरत करने। आधे धन्टे बाद लौटे तो कविता तैयार थी - "ताल ठोक कर खड़ा हुआ है लालचीन देखो"। और भी तमाम बहुत कुछ बनारसी मस्ती के दिनों के त्रिलोचन पर।

फिर जब वे जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष हुए तो मुलाकात के अवसत बढ़े। बैठकों, गोष्ठियों और सम्मेलनों में बार-बार मिलना हुआ। गोष्ठियों में उनकी विद्वता और बातचीत में उनके विश्वकोक्शीय ज्ञान से बराबर साक्षात्कार हुआ। खुद कुछ शुरू करें या किसी का जवाब दे रहे हों, कहाँ कहाँ से होते हुए कहाँ के कहाँ पहुँच जाते थे। कभी लगता अब बहक गये पर एक लम्बी विश्व्यात्रा पूरी करके फिर उस तमाम विषय को अपने मूल विषय से जोड़कर चमत्कृत कर देते। बाल की खाल नहीं उधेड़ते थे, बात को ही परत दर परत खोलते चले जाते थे। कभी बूंद को फैलाकर समुद्र कर देते और कभी समुन्दर को समेट कर बंधी मुट्ठी के अंगूठे पर बनने वाले गड्ढे में समो देते थे। एक बैठक में किसी मुद्दे पर बहस कुछ ज्यादा ही लम्बी खिंच गई। महासचिव ने अध्यक्षीय भाषण के लिए त्रिलोचन जी को बुलाया तो मेरे बगल में बैठे एक साथी ने मेरे कान में कहा, "लंच टला डिनर तक" लेकिन त्रिलोचन जी ने जिस तरह चार पाँच जुमलों में बहस का सार और समाधान पेश किया वह देखने सुननेवालों से ही ताल्लुक रखता था।

पुरलुत्फ आदमी थे। चुटकुले खूब सुनाते। बात को दिलचस्प बना देना भी खूब जानते थे। जमकर ठहाके लगाते और सुनने वालो को हंसा हंसा कर बेदम कर देते। एक बार बोले "कोई भाषा सीखनी हो तो उसकी गालियाँ पहले सीखिए।" क्यों पूछने पर बतलाया - "महामना मदन मोहन मालवीय ने महाराष्ट्र में एक सभा में अपने भाषण में चोट शब्द का इस्त्तेमाल किया तो ठहाका लगने लगा। महामना ने आहत होकर कहा आपके इस व्यवहार से मुझे फिर चोट कगी है। ठहाके चौगुने हो गए। बगल में बैठे मराठीभाषी सज्जन ने उन्हें टोका - आघात कहिए चोट यहाँ गाली है।" (क्रमश:....)

Monday, December 10, 2007

कला कम्यून; कल आज और कल

उदय यादव
सपने तो बचपन के हैं - देश के लिये समाज के लिये कुछ करने के। इन्हीं सपनों के उधेड़ - बुन में जवान हुआ। गांव, कस्बा, मुहल्ला से गुजरते हुए शहर पहुँचा (ढेर सारे दोस्त वहीं छूट गये)। डर लगा कि कितने अकेले हो गये। अलग-अलग जगहों से आई जमात मिली तब लगा कि कितने भाग्यशाली थे हम।
अभी अकादमिक पढ़ाई में मन रमा ही था कि चारों ओर हो रही उठा - पटक ने फिर बचपन के भूत को जगा दिया। वहीं इसे जड़ जमाने के लिए आधार भी मिला लेकिन समीकरण बदल गया। बचपन में हम अधिकारी थे सवाल पूछने के लिए लेकिन अब जवाब के लिए जिम्मेदार हो गये। निज के लिए पढ़ाई और देश समाज के लिए नाटक, स्टडी सर्किल और आन्दोलन में हिस्सा लेने लगे। पता नहीं चला कि कब निज हाशिए पर चला गया। लगभग हम सभी पूर्णकालिक हो गये। घर - परिवार, अपनों (तथाकथित) द्वारा बस एक सवाल -’ नाटक करते हो और क्या करते हो? जीवन कैसे चलेगा?..’ इस पर हमलोग सामने वाले को नासमझ और तुच्छ मानकर ही जवाब देते। लब्बो - लवाब यह कि जीवन से ज्यादा देश और समाज को खतरा है उसे बचाने की कोशिश करो। इस पर वे चुप्पी साध लेते। लेकिन मौका मिलते ही फिर दाग देते सवाल। अब इनके सवालों का परवाह किये बिना स्कूल - कालेज, विश्वविद्यालय, दफ्तर में जाकर अपनी जमात तैयार करने लगे। इसमे कुछ हमराही, कुछ समर्थक और कुछ दयानिधान भी बन जाते। जो मौके - बेमौके आर्थिक मदद और नैतिक समर्थन करते रहते।
हम लोगों में कई तरह के लोग थे - सीधे-साधे, गुस्सैल, डरपोक, हिम्मती, अपने में गुम, खोये - खोये से, नशेड़ी, चालबाज़ आदि-आदि लेकिन बुद्धि के सब धनी थे। भाषण देना, गाना गाना, लिखना, पेंटिंग-स्केच, पोस्टर, अभिनय, राजनितिक, सामाजिक, सैद्धान्तिक बहस और समाज काल परिस्थिति को समझने के लिए खूब पढ़ाई हमारी फितरत थी। धीरे - धीरे आकादमिक पढ़ाई से नाता टूट ही गया।
समय के साथ - साथ ’ नाटक करते हो और क्या करते हो?’ वाला सवाल अपना सवाल बन गया। ग्रुप में एक बेचैनी घर कर गयी। बिना व्यवस्था बदले कुछ नहीं होने वाला। सवाल पहाड़ की तरह खड़ा हो गया। समाधन के लिये कुछ ने पार्टी की राह चुनी, कुछ ने निजि धंधे शुरू किये, कुछ ने महानगरों की ओर रूख किया और कुछ वहीं डटे रहे। यहां व्यवस्था फिर आड़े आयी और हम जहां के तहां हो गये। लेकिन जहां-जहां हम गये सवाल पीछा करता रहा। अलग - अलग मौकों पर अलग- अलग रुप में। भागने की कोशिश करते सामने आ खड़ा होता। सब कुछ भुलाकर सो जाते कम्बख्त सपने में भी आ धमकता। खूब रंग दिखाया, कई कमाल किया और करवाया भी। अब तक हम सबको पर जम गये थे। तर्कों की दुनियां हमारी मुठ्ठी में थी। हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन बन्धु एक चीज़ बिगड़ गयी। दो फांक हो गयी। एक तरफ खड़ा हुआ व्यक्ति और दूसरी तरफ वैचारिक समूह। आइये वैचारिक समूह वाली राह पर चलते हैं।
तमाम उठा पटक और ऊबड़ - खाबड़ राहों से गुजरते हुए बुनियादी सवाल को केन्द्र में लाया गया। मत बना कि चलो नए सिरे से फिर शुरू करते हैं और शिद्दत से खोजते हैं कला में जीवन की राह।
"कला कला के लिए न हो जीवन के लिए हो" इस मूल के साथ खोज शुरू हुई।
1996. बनारस. किसान आन्दोलन के साथियों के सौजन्य से एक नाटक की टीम के साथ के गांवों का दौरा। लोक जीवन और लोक संस्कृति से रुबरू होते ही मानों जमीन मिल गई। उर्वरक जमीन। यह तय है कि अगर इससे कट गये तो सूख जायेंगे (गलत फहमी न हो कि कट कर सुख पायेंगे)। लहलहाती ऊर्जा से लबरेज बनारस लौटे। नौकरी पेशा, दुकानदार, मजदूर और छात्रों के बीच संपर्क शुरू हुआ। ’हम बदलेंगे तो जग बदलेगा’ की राह (जो चोरी छिपे तमाम प्रगतिशीलों के दिमाग में अपनी जगह बनाये हुए है) के बजाय "व्यवस्था बदलेगी तभी समाज और लोगों का जीवन बदलेगा" की राह पर चल पड़े। व्यवस्था को बदलने के लिए व्यवस्था चाहिए।
इसी सिस्टम (Mother organisation: Centre for Research and Application in Folk arts Film & Theatre - CRAFFT) को बनाने की एक कोशिश है "कला कम्यून"
पिछले दस सालों से कला कम्यून के लोग ( दर्जनों लोग आये और गये भी ) जीवन, रचना, विचार और आन्दोलन को सामूहिक तरीके से तय कर रहे हैं। नाटक - गायन टीम, फिल्म सोसाइटी, चित्रकला, मूर्तिकला, ग्राफिक डिजाइन, कविता/गद्य पोस्टर, सेमिनार, विचार गोष्ठी, पुस्तकालय, स्टडी सर्किल व कला आयोजनों के जरिए समाज से रुबरू होते रहते हैं। सब एक छत के नीचे रहते हैं। सामूहिक मेस में खाना खाते हैं। बुद्दिजीवियों, कलाकारों, प्रगतिशील खेमों, आम-जन और साथ ही साथ देश-विदेश में फैले उन तमाम दोस्तों से संपर्क - संबन्ध बनाकर नित नये प्रारुप को गढ़ने की कोशिश में रहते हैं। निजी जीवन के लिए कला से सम्बन्धित कमर्शियल फर्म ( Vikalp Communications) चलाते हैं।
फिलहाल आज इतना ही। आगे पिछ्ली यात्रा के अनुभव, आने वाले कल के लिए आज की समझ और तमाम रचनाकारों के रचना संसार के साथ आते रहेंगें। (क्रमश:.......)

चलिए....
कन्धे से कन्धा मिलाते हैं कवि शम्भुदत्त शैलेय से। जो रुद्रपुर के निवासी हैं। राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में पढ़ाते हैं........