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Tuesday, December 18, 2007

महा कवि का महाप्रयाण -२

अजय कुमार

सुनने पढ़ने में सतर्क थे। एक बार विषय ठीक से पता न होने के कारण मैंने उर्दू कविता में सामाजिक बदलाव के बदले उर्दू कविता का इतिहास ही लिखमारा। एक साथी ने कमेंट किया "अजय जी बदलाव की चर्चा करने के बजाय इतिहास ही लिख लाये"। अध्यक्षीय वक्तव्य में त्रिलोचन जी ने कहा, " आधार पत्र में तमाम कवियों के संदर्भ सामाजिक बदलाव के ही संदर्भ हैं। लगता है आपने ध्यान से नहीं सुना है।" जाहिर है त्रिलोचन जी ने ध्यान से सुना था। एक गोष्ठी में मिलते ही कहा, "वामिक साहब की आत्मकथा 'समय' के हर अंक में नहीं छाप रहे हो।" मैंने कहा, "नहीं हर अंक में छ्प रही है।" जौनपुर लौटकर कन्हैया, जिस पर अखबार छ्पवाने की जिम्मेदारी थी, जिक्र किया तो उसने कहा, "ठीक कह रहे थे, एक अंक में नहीं जा पाई थी।" यानी 'समय' ध्यान से पढ़ते थे और आत्मकथा का लगता है इन्तज़ार करते थे।

लखनऊ के दलित साहित्य सेमिनार के मौके पर मुझे त्रिलोचन जी के साथ उस कमरे में ठहरने का सौभाग्य मिला जिसे दिन में कामरेड विनोद मिश्र ने खाली किया था (अपनी लुंगी भी वे खिड़की पर टंगी हुई भूल गये थे)। तब तक सर्दी बाकायदा शुरु नहीं हुई थी लेकिन गेस्ट हाउस लान के बीच और नहर के किनारे होने के कारण कमरा ख़ासा ठंडा था। सोने के लिये त्रिलोचन जी ने अपनी ऊनी चादर निकाली और मेरे पास कुछ न देखकर सलाह दी कि दरवाजों के पर्दे उतार लीजिये। मैंने कान नहीं दिया और एक रिश्तेदार के लिये भिजवाई आशा की साड़ियाँ ओढ़कर सो गया। रात ऎसी गुज़री कि अब भी याद है। और उनकी नेक सलाह भी "पर्दे उतार लीजिये"।

सेमिनार के बाद अतिथिगृह जाते हुए टेम्पो में मेरी किसी बात पर बोले, " आपसे कौन जीत सकता है? आप तो अजय हैं।" मैंने कहा अजय माने तो हुआ जिसकी जय न हो। बोले, "नहीं जिसको जीता न जा सके।" और मानस की एक अर्ध्दाली सुना दी "जीत सकै को अजय रघुराई"। फिर बताया, "जाट कोई एक जात नही है। सभी जाति के लड़ाकुओं को मिलाकर बनी जात है।" प्रमाण पेश किया - "अवधी में जाट का अर्थ होता है लड़ाकू। कहते हैं फलनवा बड़ा जट्ट आदमी है"। यानी वे सिर्फ मुझे, भाई और पिता को ही नहीं जानते थे; खानदान की खबर भी रखते थे।

वहीं अतिथिगृह के भोजनकक्ष में डोंगों और प्लेटों के आदान-प्रदान के बीच किसी ने हरी मिर्च की प्लेट मेरी तरफ बढ़ाई-"क्या आप इसे लेना पसन्द करेंगे?" मेरे मुँह से निकला- "मैं उसे देखना भी पसन्द नहीं करता।" बातचीत के दौरान खाने-पीने की चीजों में औषधि गुणों की बात आ गई। त्रिलोचन जी आदत के अनुसार कोर्सेस में लंच ले रहे थे यानी दाल रोटी सब्जी बारी-बारी से निपटा रहे थे। बिना दाहिने बायें देखे बोले, "जिसे अजय जी देखना भी पसंद नहीं करते उसमें भी अनेक औषधि गुण हैं। इलाहाबाद में राष्ट्रीय परिषद की बैठक के दौरान जब हमलोग नर्मदेश्वर जी के यहाँ से खाना खाकर आ रहे थे त्रिलोचन जी एक पेड़ के पास ठिठ्क गए। बोले, "यह बकाइन है, भैषजशास्त्र में इसे महानीम कहते हैं। इसमें बड़े औषधि गुण होते हैं।" उनके इस गुण के बारे में अवधेश जी से सुन चुका था। कितने ही अनाम पेड़ पौधों के नाम उन्हें उनसे पता चले थे। कितने ही फूलों के संस्कृत नाम भी। वे माटी से जुड़े निहायत ज़मीनी आदमी थे। तभी माटी की गंध से सुवाषित ऎसी अमर रचनाओं का भण्डार छोड़ गये हैं वे अपने पीछे। और भी उस दौर में जब हिन्दी कविता आयातित विचारों से इस कदर आक्रांत थी। अच्छे-अच्छे विदेशी मुहावरों का अनुवाद कर रहे थे नये के नाम पर।

अपने पिता की जन्मशताब्दी की अध्यक्षता करने के लिए मैंने उन्हें आमंत्रित किया। जवाब आया- " आप बुलायें और मैं न आऊँ यह कैसे हो सकता है।" इस अवसर पर पिता के तीन कर्मक्षेत्रों - स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता और साहित्य पर सेमिनार हुए और इन तीन क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए तीन लोगों को "समय सम्मान" से सम्मानित किया जाना था। साहित्य के लिये त्रिलोचन जी को चुना गया था। सम्मान समारोह शुरु होने के पहले वे बोले, " आप का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ अब मुझे छुट्टी दीजिये तो ए.जे. पकड़ कर निकल जाऊँ और एक दिन इलाहाबाद भी रुक लूँ।" तब तक सम्मान पत्र फ्रेम होकर नहीं आ पाये थे। मैंने माला और शाल से सम्मान की औपचारिकता पूरी करके उन्हें विदा किया। थोड़ी ही देर में सम्मान पत्र भी फ्रेम होकर आ गया तो भागकर स्टेशन पहुँचा। प्लेटफार्म नम्बर दो पर इलाहाबाद जौनपुर पैसेन्जर का इन्तज़ार करते हुए त्रिलोचन जी एक बेंच पर आसीन थे। मैंने सम्मान पत्र दिया तो रैपर का काग़ज़ हटाकर सम्मान पत्र को देखा और अटैची में रख कर बोले, " इसमें भी एक लतीफा है। जब कोई लिखना बन्द कर देता था तो हम लोग उसे महाकवि की उपाधि दे देते थे।" मैंने सम्मान पत्र में उनके नाम के पहले महाकवि लिखवा दिया था, जो वो थे भी।

एक लतीफा इसमें और रह गया। आशा जिसके सर पर उनके खाने-ठहरने का इन्तजाम था, उनके सहायक से पता करके सब कुछ ठीक ठाक निपटा दिया था। यहाँ तक कि थरमस में गरम पानी भी बिस्तर के सिरहाने रख दिया था। सुबह नाश्ते के लिए दलिया वगै़रह लेकर आयी तो पूछा, " आपको यहाँ कोई तकलीफ तो नहीं हुई?" वे लोगो से घिरे बतिया रहे थे, मुड़कर बोले, " जिसकी आप जैसी माँ हो उसे भला क्या तकलीफ हो सकती हैं।" आशा खिसिया गई, हो सकता हैं कोई हँस दिया हो। वहाँ क्या कहती मुझको पूरा वाक़या सुनाकर बोली, "तुम्हारे त्रिलोचन जी सठिया गये हैं क्या? भला मैं उनकी माँ जैसी लगती हूँ?" मैंने ठहाका लगाया तो और बौखला गई। मैंने दिलासा दिया, "माँ से उनका मतलब था माँ जैसी देखभाल करने वाला।" तब लगा जैसे उसे अपने किये का प्रतिदान मिल गया है।

Saturday, December 15, 2007

महा कवि का महाप्रयाण -१

अजय कुमार


(हिन्दी की प्रगतिशील कविता की अंतिम कड़ी त्रिलोचन शास्त्री का 9 दिसंबर शाम उनके निवास पर निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। हिन्दी कविता के इतिहास में शमशेर, नागार्जुन, केदार और त्रिलोचन जी का अलग महत्व रहा है। इन्होंने हिन्दी में प्रगतिशील धारा को स्थापित किया। श्री शास्त्री जी का निधन हिन्दी की प्रगतिशील और जनपदीय चेतना की कविता के लिए बड़ी क्षति है। उनके निधन से एक युग का अंत हो गया। वह जनसंस्कृति मंच के पुर्व अध्यक्ष भी थे। बनारस के तमाम कलाकारों, साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों और जनसंस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। साहित्यकार अजय कुमार जी, जो सेवा प्रेस जौनपुर के रहने वाले तथा जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, त्रिलोचन जी के साथ बिताए कुछ छ्ड़ो को हमारे साथ याद कर रहे हैं)


आठवीं पार्टी कान्फरेन्स के लिए धनबाद ट्रेन पकड़ने के लिए हजारीबाग रोड से चली पैसेंजर ट्रेन के ठसाठस भरे डब्बे में कुछ देर खड़े खड़े द्रविण प्राणायाम करने के बाद जैसे ही कमर सीधी करने के लिए एक सीट का सहारा मिला और मैंने बैग से महाश्वेता देवी का "अमृत संचय" निकालकर बनारस में कर्नल नील के अत्याचारों के ब्योरे पर नज़र दौड़ानी शुरु की कि उदय ने भीड़ से सरक कर कन्धा थपथपाया और खबर दी - "त्रिलोचन जी गये"। उनकी पिछली बीमारी की खबर भी दिल्ली जाते हुए ट्रेन में मिली थी वाचस्पति जी से। स्मृतिलोप का पता "समयान्तर" में अजय सिंह के लेख को ट्रेन में ही पढ़ते हुए चला और अब उनके आखिरी सफर की खबर भी मिली सफर करते हुए।
तो इस तरह खतम हुआ संघर्षशील और सार्थक जीवन का एक लम्बा सफर। खबर के साथ शुरु हुआ मेरी यादों का सफर। बुकमार्क लगाकर किताब बैग में रख दी और मुड़ गया महाश्वेता देवी और नील के 1857 के बनारस से त्रिलोचन के बनारस की ओर। भाई (दम्मू जी) ने पहली बार उनसे मिलाया था "जनवार्ता" के कार्यालय में। वे कुर्ता खूंटी पर टांगकर खद्दर की बंडी और पायजामा पहने हुए मेज - कुर्सी पर डटे कुछ लिख रहे थे। तपाक से मिले। पिता के और समय (अखबार) के बारे में बात करते रहे। बातें क्या हुई कुछ याद नहीं। तब मै त्रिलोचन होने का मतलब ही नहीं जानता था। दूसरी मुलाकात भी डा. अवधेश प्रधान ने बनारस में ही कराई रथयात्रा चौमुहानी पर स्थित उनके घर पर। मेरा परिचय मिलते ही बड़ी आत्मीयता से पिता, भाई और अखबार के बारे में पूछा, "समय समय की बात समय पर मुझ तक नहीं पहुँच रही है आजकल" (भारत नीति गगन में निर्मल जीवन ज्योति जगावेगा / समय समय की बात समय पर "समय" आप बतलावेगा "समय साप्ताहिक" का आदर्श वाक्य हुआ करता था)। प्रधान जी और उनके बीच समाज, संस्कृति, इतिहास, भूगोल और भाषा पर लम्बी बातचीत होती रही। मैं दो महासमुद्रों के संगम पर बैठा सीपियां और कंकड़ चुनता रहा। मोती तो हमेशा ही निपुण गोताखोर को ही मिलते रहे हैं।

बनारस में ही एक मुलाकात और रही। लगता है अब "समय" उन्हे बराबर मिल रहा था। मिलते ही शिकायत की - " अपने भाई से कहना जैसे रामेश्वर बाबू जौनपुर और आसपास के गांव-जवार के कवियों की कविताएं छापते थे वैसे ही छापते रहें। क्रान्तिकारियों की कविताओं के अनुवाद दूसरों के लिए रहने दें।" इसी बनारस यात्रा में ठाकुर प्रसाद जी से मिला। त्रिलोचन जी की चर्चा पर बोले "जिस दिन चीनी क्रान्ति के विजय की खबर आई त्रिलोचन जी के इम्तहान चल रहे थे। हमलोग बड़ी सतर्कता के साथ उन्हे घेरे रहे कि कहीं वे पढ़ाई छोड़कर कविता लिखने में न जुट जायें। दूसरे दिन इम्तहान जाने के पहले वे लंगोट लेकर ऊपर गए कसरत करने। आधे धन्टे बाद लौटे तो कविता तैयार थी - "ताल ठोक कर खड़ा हुआ है लालचीन देखो"। और भी तमाम बहुत कुछ बनारसी मस्ती के दिनों के त्रिलोचन पर।

फिर जब वे जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष हुए तो मुलाकात के अवसत बढ़े। बैठकों, गोष्ठियों और सम्मेलनों में बार-बार मिलना हुआ। गोष्ठियों में उनकी विद्वता और बातचीत में उनके विश्वकोक्शीय ज्ञान से बराबर साक्षात्कार हुआ। खुद कुछ शुरू करें या किसी का जवाब दे रहे हों, कहाँ कहाँ से होते हुए कहाँ के कहाँ पहुँच जाते थे। कभी लगता अब बहक गये पर एक लम्बी विश्व्यात्रा पूरी करके फिर उस तमाम विषय को अपने मूल विषय से जोड़कर चमत्कृत कर देते। बाल की खाल नहीं उधेड़ते थे, बात को ही परत दर परत खोलते चले जाते थे। कभी बूंद को फैलाकर समुद्र कर देते और कभी समुन्दर को समेट कर बंधी मुट्ठी के अंगूठे पर बनने वाले गड्ढे में समो देते थे। एक बैठक में किसी मुद्दे पर बहस कुछ ज्यादा ही लम्बी खिंच गई। महासचिव ने अध्यक्षीय भाषण के लिए त्रिलोचन जी को बुलाया तो मेरे बगल में बैठे एक साथी ने मेरे कान में कहा, "लंच टला डिनर तक" लेकिन त्रिलोचन जी ने जिस तरह चार पाँच जुमलों में बहस का सार और समाधान पेश किया वह देखने सुननेवालों से ही ताल्लुक रखता था।

पुरलुत्फ आदमी थे। चुटकुले खूब सुनाते। बात को दिलचस्प बना देना भी खूब जानते थे। जमकर ठहाके लगाते और सुनने वालो को हंसा हंसा कर बेदम कर देते। एक बार बोले "कोई भाषा सीखनी हो तो उसकी गालियाँ पहले सीखिए।" क्यों पूछने पर बतलाया - "महामना मदन मोहन मालवीय ने महाराष्ट्र में एक सभा में अपने भाषण में चोट शब्द का इस्त्तेमाल किया तो ठहाका लगने लगा। महामना ने आहत होकर कहा आपके इस व्यवहार से मुझे फिर चोट कगी है। ठहाके चौगुने हो गए। बगल में बैठे मराठीभाषी सज्जन ने उन्हें टोका - आघात कहिए चोट यहाँ गाली है।" (क्रमश:....)